इंडो-नेपाल बॉर्डर पर चल रहे कितने मदरसे, UP सरकार के सर्वे के बाद इनका क्या होगा? जानिए

इंडो-नेपाल बॉर्डर पर चल रहे कितने मदरसे, UP सरकार के सर्वे के बाद इनका क्या होगा? जानिए
फोटो: इंडिया टुडे

UP News: उत्तर प्रदेश सरकार मदरसों का सर्वे करा रही है. इसके तहत कितने मदरसे रजिस्टर्ड हैं, कितने मदरसों को अनुदान मिल रहा है और कितने बिना अनुदान के चल रहे हैं, इस बात की जानकारी जमा की जा रही है. मगर इन मदरसों में कुछ ऐसे हैं जो बीते कुछ सालों में ही इंडो-नेपाल बॉर्डर पर संचालित होना शुरू हुए हैं, लेकिन अब जब मदरसों का सर्वे हो रहा है, तो ऐसे ये सवालों के घेरे में हैं.

बता दें कि यूपी तक ने शुरुआत इंडो-नेपाल बॉर्डर के उस जिले से की, जहां के नो मैंस लैंड पर ही पूरा गांव बसा हुआ है. दरअसल, हमारी टीम इंडो-नेपाल बॉर्डर के श्रावस्ती जिले के भरता रोशन ग्राम पंचायत के रोशन पुरवा मजरा में पहुंची थी. रोशन पुरवा लगभग 3000 की आबादी की ऐसी बस्ती है, जो इंडो नेपाल-बॉर्डर के नो मैंस लैंड पर बसी है. इस बस्ती के बीच से भारत और नेपाल को विभाजित करने के लिए पिलर तो गड़े हैं, लेकिन दो देशों को अलग करने वाले ये नो मैंस लैंड के पिलर अब इस बस्ती के बच्चों के लिए खेलने का जरिया बन गए हैं और जानवरों को बांधने का खूंटा.

जब हम बस्ती के अंदर गए, तो गांव के कुछ बुजुर्ग चारपाई पर लेटे गपशप करते नजर आए. बच्चे कभी नेपाल तो कभी भारत में खेल रहे थे. गांव के बुजुर्ग गुड्डू शेख हंसते हुए बताते हैं कि सुबह उठते तो भारत में हैं, लेकिन वह थोड़ी देर बाद घूमते हुए नेपाल भी चले जाते हैं.

इस गांव में मस्जिद और मदरसा की बात आई तो पता चला कि भारत की साइड में एक मस्जिद है और उसी में मदरसा चलता है. इसमें छोटे बच्चे कभी जाते हैं, लेकिन बीते कुछ दिनों से मौलवी साहब मदरसा नहीं खोल रहे हैं. मदरसा रजिस्टर्ड भी नहीं है.

इसके बाद यूपी तक की टीम बस्ती में ही इंडो-नेपाल बॉर्डर के पिलर को देखते हुए आगे बढ़ी. हमें बस्ती के ही बच्चों ने बताया कि एक मदरसा यहां पर भी चल रहा है. जब हम अंदर जाते हैं तो पता चलता है हम नेपाल में आ गए हैं और यह स्कूल श्री नेपाल राष्ट्र प्राथमिक विद्यालय है. इसी स्कूल के दूसरे हिस्से में नेपाल सरकार द्वारा मदरसा भी चलाया जाता है.

भरता राशन गढ़ गांव तो इंडो नेपाल बॉर्डर के नो मैंस लैंड पर ही बसा है, लेकिन हमने इंडो-नेपाल बॉर्डर से सटे दूसरे गांव सदही पुरवा का रुख किया तो यहां पर संचालित होने वाले मदरसा बीते 5 महीने से बंद है. गांव के रईस खान और अहमद बताते हैं मदरसा रजिस्टर्ड नहीं था जिसकी वजह से उसे बंद करना पड़ा, लेकिन नेपाल की साइड में तेजी से मदरसे खोले जा रहे हैं. नेपाल सरकार मदरसों की मदद कर रही है.

इंडो-नेपाल बॉर्डर के 62 किलोमीटर का क्षेत्र श्रावस्ती जिले में आता है. श्रावस्ती में 105 मदरसे रजिस्टर्ड हैं और जिनमें से 3 मदरसों को सरकार से अनुदान मिलता है, यानी 102 मदरसे बिना सरकारी अनुदान के चल रहे हैं. इसके अलावा सदहीपुरवा, बालेपुरवा, खैरी, परसोंना, भरथा, राशनगढ़ ऐसे गांव है, जो इंडो नेपाल बॉर्डर के नो मैंस लैंड पर या उसके पास ही बसे हैं और इन सभी गांव में एक से दो मदरसे बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं.

श्रावस्ती के बाद हमने रुख इंडो-नेपाल बॉर्डर के दूसरे सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण रुपईडीहा बॉर्डर का किया. हम बहराइच जिले के रुपईडीहा में इंडो-नेपाल बॉर्डर से सटे रंजीत बोझा गांव पहुंचे. यहां हम हम सरकारी अनुदान से संचालित होने वाले मदरसा इस्लामिया दारुल उलूम में गए. अंदर एक बड़े से हॉल में बच्चे बोल-बोल कर कुछ याद कर रहे थे, सामने मौलवी साहब पढ़ा रहे थे. हमने मदरसे में पढ़ रहे युसूफ से बात की तो उसने बताया कि मदरसे में हिंदी, अंग्रेजी और गणित पढ़ाया जाता है. अंग्रेजी में दूसरे बच्चे ने ABCD भी सुनाई.

हमने बच्चों को पढ़ा रहे मौलवी साहब से सवाल किया कि वे क्या-क्या पढ़ाते हैं, तो पता चला बच्चों को पढ़ा रहे हाफिज हारून खुद भी पहले इसी मदरसे में पढ़ते थे और अब दूसरे बच्चों को पढ़ा रहे हैं. बच्चों से बातचीत करते देख मदरसा के संचालक हाफिज मोहम्मद मुर्तजा भी आ गए और बताने लगे कि मदरसे में 122 बच्चे पढ़ते हैं. जो टीचर रखे गए हैं सभी को उसी से तनख्वाह दी जाती है. उर्दू, अरबी और कुरान की पढ़ाई के साथ अंग्रेजी, हिंदी और गणित भी पढ़ाया जाता है.

लोगों से बातचीत कर हम बाहर निकले तो पता चला कि पास में ही एक दूसरे मदरसा भी है, जो बिना रजिस्ट्रेशन के बिना सरकारी अनुदान के संचालित है. हम रंजीतबोझा गांव के इस दूसरे मदरसे में पहुंचे तो कुछ छोटे बच्चे उर्दू की किताबों को सामने रखकर पढ़ाई कर रहे थे. जामिया कसमिया नसरुल उलूम के नाम से संचालित मदरसा 14 सालों से चल रहा है. सोसाइटी रजिस्टर्ड करवा कर इस मदरसे का संचालन हो रहा है.

रंजीत गुर्जर गांव से नेपाल-बॉर्डर कितना दूर है इसका जायजा लेने के लिए हम जैसे ही गांव से बाहर निकले तो हमें पास में ही एसएसबी की बीओपी मिल गई. रुपईडीहा के रंजीत गुर्जर गांव में भी नो मैंस लैंड है, जिसकी रखवाली खुद एसएसबी करती है. ताकि नो मैंस लैंड पर कोई अतिक्रमण ना होने पाए.

आईएसआई के लिए नेपाल हमेशा ही मदद का अड्डा रहा है. आईएसआई एजेंट से लश्कर, सिमी के तमाम आतंकी बहराइच के रुपईडीहा बॉर्डर से गिरफ्तार भी किए गए हैं. रुपईडीहा बॉर्डर सबसे अहम हो जाता है. रुपईडीहा बॉर्डर की संवेदनशीलता को देखते हुए ही बॉर्डर पर सुरक्षा के लिए एसएसबी की महिला बटालियन भी तैनात की गई है.

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