उत्तर प्रदेश की सियासत को 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' जैसा कालजयी नारा देने वाले कांशीराम की जयंती पर लखनऊ में सियासी सरगर्मी तेज रही. बसपा प्रमुख मायावती सुबह-सुबह वीआईपी रोड स्थित कांशीराम स्मारक स्थल पहुंचीं. भारी उत्साह और गगनभेदी नारों के बीच उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु को पुष्पांजलि अर्पित की.मायावती ने इस मौके पर दलितों और पिछड़ों को एक बड़ा संदेश देते हुए 2027 के चुनावों के लिए कमर कसने का आह्वान किया. वहीं अखिलेश यादव और राहुल गांधी द्वारा कांशीराम को याद किए जाने पर बसपा खेमे ने तीखी प्रतिक्रिया दी है.
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मायावती का मिशनरी आह्वान
कांशीराम को नमन करने के बाद मायावती ने कैडर को संबोधित करते हुए कहा कि मान्यवर साहब ने बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के मूवमेंट को पूरे देश में जिंदा किया. उन्होंने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे 'ईमानदार अंबेडकरवादी' बनें और अपने वोटों की ताकत से 'सत्ता की मास्टर चाबी' हासिल करें. मायावती ने साफ किया कि सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति का जो सपना कांशीराम जी ने देखा था उसे चुनावी सफलता के जरिए ही पूरा किया जा सकता है.
आज के दौर में सपा और कांग्रेस भी कांशीराम जी की विरासत पर अपना दावा जता रहे हैं. सपा इसे 'PDA दिवस' के रूप में मना रही है.जबकि राहुल गांधी ने हाल ही में कांशीराम जी के कद को लेकर एक बयान दिया था. इस पर बसपा कार्यकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा 'जिस दल (सपा) ने कांशीराम साहब के नाम पर बने जिले का नाम बदल दिया, वह आज उनकी विचारधारा की बात कैसे कर सकता है? कांग्रेस और सपा ने हमेशा मान्यवर साहब के रास्ते में रोड़े अटकाए, अब चुनाव करीब आते ही यह 'नाटक' किया जा रहा है.
राहुल गांधी के बयान पर चुभन
राहुल गांधी ने कहा था कि अगर जवाहरलाल नेहरू होते तो कांशीराम यूपी के सीएम होते. यह बात बसपाइयों को काफी चुभी है. क्योंकि वे कांशीराम साहब को एक मुख्यमंत्री के पद से कहीं ऊपर 'बहुजन नायक'के रूप में देखते हैं.
कांशीराम का सियासी सफर
बता दें कि कांशीराम जी ने बामसेफ (BAMCEF), DS4 और फिर बीएसपी की स्थापना कर देश की राजनीति का रुख बदल दिया था. 1991 में वह सपा के सहयोग से इटावा से जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे थे. यही वजह है कि सपाई आज भी उनसे अपना गहरा नाता जोड़ते हैं.
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