उत्तर प्रदेश में साल 2026 के राज्यसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उम्मीदवारों की सूची सामने आते ही पार्टी के भीतर नाराजगी और रूठने-मनाने का दौर शुरू हो गया है. सबसे बड़ा झटका बरेली की आंवला लोकसभा सीट से दो बार सांसद रहे ओबीसी नेता धर्मेंद्र कश्यप ने दिया है. अपने आवास से बीजेपी का झंडा हटाने और सोशल मीडिया पर 'टाटा बाय-बाय' पोस्ट करने के बाद धर्मेंद्र कश्यप के समाजवादी पार्टी (सपा) में शामिल होने की चर्चाएं बेहद तेज हो गई हैं.
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कौन हैं धर्मेंद्र कश्यप?
धर्मेंद्र कश्यप उत्तर प्रदेश की राजनीति में रुहेलखंड क्षेत्र के प्रमुख पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) चेहरों में से एक माने जाते हैं. वे 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में आंवला सीट से बीजेपी के टिकट पर लगातार दो बार सांसद चुने गए थे. इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें बेहद करीबी मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा था. कश्यप और निषाद बिरादरी में उनकी गहरी पैठ मानी जाती है, जो बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर और पीलीभीत की कई विधानसभा सीटों पर राजनीतिक समीकरण बनाने और बिगाड़ने में निर्णायक भूमिका निभाती है.
कश्यप की 'साइकिल' की सवारी से बीजेपी को कितना नुकसान?
'UP Tak' को दिए इंटरव्यू में धर्मेंद्र कश्यप ने न केवल बीजेपी नेतृत्व के रवैये पर सवाल उठाए, बल्कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ अपनी गहरी दोस्ती की बात भी खुलकर स्वीकार की. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में समाजवादी पार्टी लगातार 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को धार देने में जुटी है. ऐसे में यदि धर्मेंद्र कश्यप सपा का दामन थामते हैं, तो अखिलेश यादव को रुहेलखंड क्षेत्र में एक मजबूत और जनाधार वाला गैर-यादव ओबीसी चेहरा मिल जाएगा. इससे इस पूरे क्षेत्र में बीजेपी के कैडर और पारंपरिक वोटबैंक के गणित पर सीधा असर पड़ सकता है.
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