Opinion: इतिहास केवल किताबों में नहीं लिखा जाता. वह शहरों के नामों, सड़कों, स्मारकों और संस्थानों में भी जीवित रहता है. आने वाली पीढ़ियां इन्हीं नामों के जरिए तय करती हैं कि इस देश ने किन लोगों को अपना आदर्श माना और किसके बलिदान को सबसे बड़ा सम्मान दिया.
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प्रयागराज के स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय (एसआरएन) का नाम बदलकरअमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर रखने की मांग इसी सवाल को फिर से सामने ला रही है. यह मांग किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जो मानते हैं कि जिस भूमि पर एक क्रांतिकारी ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, उस स्थान पर सबसे पहले उसी का नाम होना चाहिए.
सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, काकोरी के महानायक थे रोशन सिंह
जब भी काकोरी कांड की चर्चा होती है तो सबसे पहले राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी के नाम याद किए जाते हैं. लेकिन इन्हीं के साथ एक और नाम है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी थी-अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह.
रोशन सिंह शाहजहांपुर के रहने वाले थे और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सक्रिय सदस्य थे. वे पहले से ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े हुए थे. काकोरी षड्यंत्र मामले में अंग्रेज सरकार ने उन्हें भी मृत्युदंड दिया. इतिहासकारों की मानें तो वे काकोरी ट्रेन डकैती के प्रत्यक्ष सहभागी नहीं थे, लेकिन क्रांतिकारी संगठन से जुड़े होने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ गतिविधियों के आरोप में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई.
19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की तत्कालीन मलाका जेल में उन्होंने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया. बताया जाता है कि उनके अंतिम शब्दों में"वंदे मातरम्" और"भारत माता की जय" का उद्घोष था. ऐसे बलिदानियों की वजह से ही आज भारत स्वतंत्र है.
यही तो वह धरती है, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है. आज जिस परिसर में स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय संचालित है, वहीं कभी अंग्रेजों कीमलाका जेल हुआ करती थी. इसी जेल में ठाकुर रोशन सिंह को कैद रखा गया और यहीं उन्हें फांसी दी गई.
यानी यह केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की एक महत्वपूर्ण भूमि भी है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस स्थान की सबसे बड़ी ऐतिहासिक पहचान एक अमर शहीद का बलिदान है, वहां सबसे प्रमुख स्मृति किसकी होनी चाहिए?
नाम केवल पहचान नहीं, इतिहास का संदेश भी होता है
देश में पिछले कुछ वर्षों में कई स्थानों के नाम बदले गए हैं. कहीं ऐतिहासिक नाम वापस लाए गए, तो कहीं स्वतंत्रता सेनानियों और भारतीय महापुरुषों के नाम पर संस्थानों का नामकरण हुआ.
इसका उद्देश्य केवल नाम बदलना नहीं, बल्कि इतिहास के उन अध्यायों को सामने लाना भी है, जो लंबे समय तक हाशिए पर रहे. अगर किसी संस्थान का नाम उस व्यक्ति पर रखा जाता है, जिसने उसी स्थान पर देश के लिए अपने प्राण न्योछावर किए, तो यह केवल भावनात्मक निर्णय नहीं बल्कि ऐतिहासिक न्याय भी माना जा सकता है.
नई पीढ़ी को किससे परिचित कराना चाहते हैं?
आज लाखों लोग एसआरएन अस्पताल का नाम जानते हैं, लेकिन उनमें से कितने लोग जानते हैं कि इसी परिसर में ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई थी? यदि अस्पताल का नाम उनके नाम पर होता है, तो हर दिन हजारों लोगों के मन में यह सवाल उठेगा कि आखिर ठाकुर रोशन सिंह कौन थे. यही सवाल उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के उस इतिहास तक ले जाएगा, जिसे जानना हर भारतीय के लिए जरूरी है.
इतिहास को जीवित रखने का सबसे प्रभावी तरीका यही है कि उसके नायकों को सार्वजनिक स्मृति का हिस्सा बनाया जाए.
काकोरी की 100वीं वर्षगांठ सबसे उपयुक्त अवसर
वर्ष 2026 काकोरी ट्रेन एक्शन की100वीं वर्षगांठ का वर्ष है. ऐसे समय में ठाकुर रोशन सिंह जैसे क्रांतिकारी को उनके बलिदान स्थल पर स्थायी सम्मान देना केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं होगा, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक भी होगा.
राजनीति से ऊपर उठकर इतिहास को देखना होगा
इस मांग को केवल नाम बदलने की राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. सवाल यह नहीं है कि वर्तमान नाम किसका है. सवाल यह है कि जिस भूमि ने एक अमर शहीद का अंतिम बलिदान देखा, क्या उसकी पहचान उस बलिदान से जुड़नी चाहिए? सही मायनो में स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय का नाम बदलकर अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह चिकित्सालय करना केवल एक नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि इतिहास के प्रति सम्मान और एक लंबे समय से प्रतीक्षित ऐतिहासिक न्याय भी होगा.
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)
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