बेटी 6 साल की होगी, तभी मुस्कान को दी जाएगी फांसी? डीजीसी क्रिमिनल केके चौबे ने समझाया पूरा कानून

उस्मान चौधरी

16 Oct 2026 (अपडेटेड: 16 Oct 2026, 09:31 PM)

मेरठ के नीले ड्रम हत्याकांड में मुस्कान और साहिल को मौत की सजा सुनाई गई है. अब सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है. मुस्कान की एक साल की बेटी जब तक छह साल की नहीं होगी मुस्कान को फांसी नहीं मिल सकती है. डीजीसी क्रिमिनल केके चौबे ने यूपी तक से बातचीत में इस दावे की सच्चाई बताई है और मुस्कान के पास मौजूद विकल्पों को बताया है.

DGC Criminal KK Chaubey

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मेरठ के चर्चित नीले ड्रम हत्याकांड में कोर्ट ने आरोपी पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को फांसी की सजा सुनाई है. अब इस मामले में सोशल मीडिया पर एक और बहस छिड़ गई है. दावा किया जा रही है कि मुस्कान की एक साल की बेटी जब तक 6 साल की नहीं हो जाती है, उसको फांसी की सजा नहीं दी जा सकती है. हालांकि इस तरह के दावे पूरी तरह से भ्रामक है और इनमें कोई सच्चाई नहीं है.

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अब इस कानूनी मामले में मेरठ के डीजीसी क्रिमिनल केके चौबे ने यूपी तक से खास बातचीत की है. यूपी तक को जानकारी देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि कानून में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि बच्ची के 6 साल का होने तक फांसी की सजा पर रोक लग जाए, हालांकि मुस्कान के पास अभी ऊपरी अदालतों में अपील करने के कई कानूनी विकल्प मौजूद हैं.

क्या है 6 साल वाला नियम

डीजीसी क्रिमिनल केके चौबे ने यूपी तक को बताया कि लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि अगर महिला के साथ छोटी बच्ची है, तो उसे 6 साल तक फांसी नहीं हो सकती है. उन्होंने साफ किया है कि यह कानून जरूर है कि बच्ची अपनी मां के साथ जेल में 6 साल की उम्र तक रह सकती है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इससे फांसी की सजा टल जाएगी.

सजा पर रोक की बात गलत

डीजीसी क्रिमिनल केके चौबे के मुताबिक अगर तमाम कानूनी प्रक्रियाएं पूरी हो जाती हैं और यह तय हो जाता है कि फांसी होनी ही है, तो कोर्ट 6 साल से पहले भी मृत्युदंड का आदेश दे सकती है. बच्ची के 6 साल के होने तक फांसी की सजा पर अपने आप रोक लग जाने की बात पूरी तरह से गलत है. इसमें कानून की तरफ से कोई बाध्यता नहीं है.

मुस्कान के पास बचे कानूनी विकल्प

निचली अदालत से मौत की सजा मिलने के बाद भी मुस्कान के लिए कानूनी रास्ते अभी पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं. केके चौबे ने बताया कि हमारी वैधानिक व्यवस्था में अभियुक्त को यह अधिकार मिला हुआ है कि वह जिले स्तर की अदालत की सजा के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपनी अपील कर सकता है.

हाईकोर्ट से राष्ट्रपति तक का रास्ता

यूपी तक से बातचीत में वकील ने बताया कि मुस्कान अब इस फैसले के खिलाफ सबसे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है. अगर वहां से भी राहत नहीं मिलती है, तो वह सुप्रीम कोर्ट जा सकती है. इसके बाद भी अंतिम विकल्प के रूप में देश के राष्ट्रपति के सामने दया याचिका दाखिल की जा सकती है. 

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