प्रेमानंद महाराज का असली नाम क्या है, कहां हुआ था उनका जन्म? 5 अनसुनी बातें

यूपी तक

• 03:38 PM • 08 Oct 2026

वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज का शुरुआती नाम अनिरुद्ध कुमार पांडेय बताया जाता है. उनका जन्म 1972 में कानपुर देहात के सरसौल क्षेत्र के अखरी गांव में हुआ था.

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वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज को आज लाखों लोग सुनते हैं. उनके सत्संग और राधा-कृष्ण भक्ति से जुड़ी बातें सोशल मीडिया पर भी खूब देखी जाती हैं, लेकिन जिस नाम से आज उन्हें दुनिया जानती है, वह उनका बचपन का नाम नहीं था. 

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प्रेमानंद महाराज का शुरुआती जीवन उत्तर प्रदेश के कानपुर क्षेत्र के एक गांव में बीता था. प्रेमानंद महाराज बनने से पहले उनका एक और नाम था- अनिरुद्ध कुमार पांडेय. अब सवाल है कि कानपुर के एक गांव में जन्मा ये बच्चा आगे चलकर वृंदावन का चर्चित संत कैसे बना?

कानपुर के अखरी गांव में हुआ था जन्म

प्रेमानंद महाराज का जन्म 1972 में कानपुर देहात के सरसौल क्षेत्र के अखरी गांव में हुआ था. परिवार खेती से जुड़ा था. माता-पिता का नाम रामा देवी और शंभू पांडेय है. एक भाई संस्कृत के विद्वान थे और उनके संपर्क में आने के बाद कम उम्र में ही अनिरुद्ध का झुकाव धार्मिक गतिविधियों की तरफ बढ़ने लगा था.

बचपन से ही पूजा-पाठ में रुचि

अनिरुद्ध कुमार पांडेय कम उम्र में ही श्रीमद्भागवत का पाठ करने लगे थे. हनुमान चालीसा का भी पाठ करते थे. आगे चलकर उनकी आध्यात्मिक यात्रा ने उन्हें घर-परिवार से दूर कर दिया. यहीं से वह धीरे-धीरे उस रास्ते पर बढ़े, जिसने आगे चलकर उन्हें प्रेमानंद महाराज की पहचान दी.

13 साल की उम्र में लिया पहला दीक्षा संस्कार

करीब 13 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार दीक्षा ली. इसके बाद उनका नाम आर्यन ब्रह्मचारी बताया गया. आगे राधावल्लभी संप्रदाय में दीक्षा लेने के बाद उनका नाम आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी हुआ. बाद में उनकी आध्यात्मिक यात्रा वृंदावन की ओर बढ़ी.

काशी में बीता साधना का दौर

घर छोड़ने के बाद प्रेमानंद महाराज कुछ समय सरसौल के नंदेश्वर धाम में रहे. इसके बाद वाराणसी पहुंचे. काशी में गंगा किनारे स्नान, ध्यान और पूजा उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था. तुलसी घाट पर भगवान शिव की साधना करते थे. इसी दौरान रासलीला से उनका परिचय हुआ और राधा-कृष्ण भक्ति की ओर उनका झुकाव बढ़ने लगा.

फिर वृंदावन पहुंचे और बदल गई पहचान

वाराणसी के बाद उनकी आध्यात्मिक यात्रा वृंदावन पहुंची. यहां उनका जुड़ाव राधावल्लभ संप्रदाय से हुआ. बाद में गुरु गौरांगी शरण महाराज की संगत में करीब 10 साल रहे. इसी दौर में उनकी पहचान प्रेमानंद गोविंद शरण के रूप में बनी और आगे चलकर भक्त उन्हें प्रेमानंद महाराज के नाम से जानने लगे.

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