देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में सुनवाई के दौरान वकील के भेष में पहुंचकर हंगामा काटने और जजों के सामने पेपर फेंककर दुर्व्यवहार करने की घटना ने सबको हैरान कर दिया था. लेकिन सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर ऐसा गदर मचाने वाला यह प्रबल प्रताप यादव आखिर कौन है? वो किस मामले को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गया था? दरअसल इसके पीछे एक ऐसी सनक, एकतरफा विवाद और बदले की कहानी है जो लखनऊ की एक सॉफ्टवेयर कंपनी से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक जा पहुंची. एक लड़की को परेशान करने के आरोप में नौकरी से निकाले जाने के बाद इस शख्स ने कंपनी को बर्बाद करने की ऐसी ठानी कि खुद सुर्खियों में आ गया.
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कौन है प्रबल यादव
सुप्रीम कोर्ट में दुर्व्यवहार करने वाला आरोपी प्रबल प्रताप यादव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के भरथना का रहने वाला है. वह पेशे से एक टेक प्रोफेशनल है और लखनऊ के विकास नगर स्थित एक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी में काम करता था.
विवाद की असली वजह
मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे फसाद की जड़ लखनऊ की उसी सॉफ्टवेयर कंपनी से शुरू हुई जहां प्रबल प्रताप काम करता था. आरोप है कि कंपनी में काम करने के दौरान प्रबल प्रताप अपने ही साथ काम करने वाली एक सहकर्मी को परेशान करने लगा था. वह उस लड़की को लगातार आपत्तिजनक और गाली-गलौज वाले ई-मेल भेज रहा था. जब लड़की ने इसकी शिकायत की तो कंपनी प्रबंधन ने प्रबल प्रताप को सुधरने की सख्त चेतावनी दी. इसके बावजूद जब वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया तो कंपनी ने कड़ा रुख अपनाते हुए उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया.
नौकरी से निकाले जाने के बाद प्रबल प्रताप यादव के सिर पर बदले का भूत सवार हो गया. उसने कंपनी को सबक सिखाने के लिए कानून का सहारा लिया और कंपनी पर 'देश विरोधी गतिविधियों' में शामिल होने का गंभीर मनगढ़ंत आरोप मढ़ दिया.इस साजिश के तहत उसकी कानूनी दौड़ कुछ इस तरह आगे बढ़ी.
नवंबर 2025 में प्रबल प्रताप ने लखनऊ की सीजेएम (CJM) कोर्ट में अर्जी डालकर उक्त कंपनी के खिलाफ देश विरोधी काम करने की एफआईआर दर्ज करने की मांग की. मामले की गंभीरता को देखते हुए एसीजेएम कस्टम कोर्ट ने पुलिस से इस पर जांच रिपोर्ट मांगी.
26 फरवरी 2026 में पुलिस की रिपोर्ट आने के बाद कोर्ट ने प्रबल प्रताप से आरोपों से जुड़े सबूत मांगे. पर्याप्त प्राथमिक सबूत न होने के कारण कोर्ट ने सीधे एफआईआर का आदेश न देकर इसे एक कंप्लेंट केस के रूप में दर्ज कर लिया.
6 अप्रैल में कोर्ट में सबूत पेश करने की तारीख थी. लेकिन अपनी सनक में चूर प्रबल प्रताप ने निचली अदालत के एफआईआर दर्ज न करने के फैसले के खिलाफ सीधे इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में अपील दायर कर दी. उसने मांग की कि कंप्लेंट केस को रद्द कर पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया जाए.
हाईकोर्ट से झटका: हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद प्रबल प्रताप की याचिका को खारिज कर दिया. माननीय कोर्ट ने साफ कहा कि जब निचली अदालत में पहले से ही सुनवाई चल रही है तो कानूनन तथ्यों को वहीं रखा जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट में ड्रामा और दुर्व्यवहार
हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद भी प्रबल प्रताप की सनक शांत नहीं हुई. उसने हाईकोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. जब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई शुरू हुई और कोर्ट का रुख उसकी उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा तो वह आपा खो बैठा. उसने अदालत की मर्यादा को तार-तार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज को 'ज्यूडिशियल सर्वेंट' कहा और पुलिस पर कार्रवाई की मांग की. इसके साथ ही उसने कोर्ट में कागज दिखाए और उसे हवा में उड़ा दिया. सुप्रीम कोर्ट के जजों ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का निर्णय लिया.
स्थानीय स्तर पर और कानूनी गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि कैसे एक सिरफिरे आशिक और नौकरी से निकाले गए कर्मचारी ने अपनी निजी खुन्नस और बदले की भावना को देशद्रोह का रंग देने की कोशिश की. पहले लखनऊ की अदालत फिर हाईकोर्ट और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में हंगामा करके इस शख्स ने खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है.
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