हरीश राणा की इच्छा मृत्यु केस लड़ने वाले एडवोकेट मनीष जैन ने यूपी तक के साथ एक विशेष बातचीत में इस भावुक और कानूनी रूप से जटिल मामले के कई अनसुने पहलुओं को साझा किया है. हरीश राणा, जो पिछले 13-14 वर्षों से वेजिटेटिव स्टेट (Vegetative State) में थे, उनके लिए सुप्रीम कोर्ट ने 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छा मृत्यु) की अनुमति दी है. आपको बता दें कि जनवरी 2024 में ब्रह्माकुमारी आश्रम की एक दीदी के माध्यम से यह मामला मनीष जैन के पास आया.
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जब एडवोकेट अपनी टीम और इंटर्न्स के साथ पहली बार हरीश के घर गए, तो वहां की स्थिति देखकर उनके इंटर्न्स इतने भावुक हो गए कि उनसे कुछ लिखा भी नहीं जा रहा था. हरीश के पिता, जो एक फाइव स्टार होटल में शेफ थे, उन्होंने अपने बेटे की सेवा के लिए अपना घर तक बेच दिया और गाजियाबाद शिफ्ट हो गए ताकि बेहतर सुविधाएं मिल सकें.
कानूनी लड़ाई: हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिका यह कहकर खारिज कर दी थी कि हरीश किसी 'लाइफ सपोर्ट' (जैसे वेंटिलेटर) पर नहीं है. मनीष जैन ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि खाने की नली (PEG Tube) और म्यूकस निकालने वाली ट्यूब भी लाइफ सपोर्ट का ही हिस्सा हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एम्स (AIIMS) के सात विशेषज्ञों की टीम बनाई, जिसने पुष्टि की कि हरीश के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है.
'पैसिव यूथेनेशिया' की प्रक्रिया
मनीष जैन ने बताया कि पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ 'गरिमापूर्ण मृत्यु' है. इसमें मरीज को प्रकृति की गोद में छोड़ दिया जाता है. वर्तमान में हरीश एम्स के पैलिएटिव केयर (Palliative Care) में हैं, जहां डॉक्टर धीरे-धीरे उनकी ट्यूबें हटाएंगे और उन्हें प्राकृतिक अवस्था में छोड़ देंगे.
कोर्ट रूम का माहौल
फैसले के दिन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस विश्वनाथन दोनों बहुत भावुक थे. आखिरी 15 मिनट पूरी कोर्ट में सन्नाटा था और जजों की आंखें भी नम थीं. जजों ने फैसले से पहले हरीश के माता-पिता और भाई-बहन से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर उनकी राय जानी थी.
सोशल मीडिया और अफवाहों पर स्पष्टीकरण
एडवोकेट ने उन खबरों का खंडन किया जिनमें कहा जा रहा था कि हरीश की मृत्यु हो गई है. उन्होंने स्पष्ट किया कि परिवार ऐसी गलत सूचनाओं से बहुत दुखी है और वर्तमान में केवल एम्स और परिवार के पास ही सही जानकारी है.
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