महापंचायत: जिस राजनीति ने UP में जनसंघ को चखाया था सत्ता का स्वाद, वही BJP पर पड़ेगी भारी?

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उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में रविवार, 5 सितंबर को भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगवाते हुए कहा कि इसके साथ-साथ ‘हर-हर महादेव’ का नारा भी लगता रहेगा. टिकैत ने ‘किसान महापंचायत’ को संबोधित करने के दौरान यह बात कही.

महापंचायत से ठीक पहले यूपी तक के साथ बातचीत में टिकैत यह भी कह चुके थे कि किसान आंदोलन में शामिल संयुक्त किसान मोर्चा चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं है. पर सवाल यह है कि अगर चुनाव नहीं लड़ा जाएगा तो क्या ‘किसान महापंचायत’ और उसके मंच से अल्लाहु अकबर और हर-हर महादेव के नारे के जिक्र का राजनीतिक असर भी नहीं होगा?

वैसे तो राजनीतिक असर का पता सही मायने में चुनावी नतीजे में ही चलता है और अभी यूपी के विधानसभा चुनाव में थोड़ा वक्त भी है, लेकिन मौजूदा किसान आंदोलन और इस महापंचायत से पश्चिमी यूपी की उस परंपरागत राजनीति के संकेत मिले हैं, जिसका सूत्रधार पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को माना जाता है.

क्या किसान आंदोलन पश्चिमी यूपी की सियासी तस्वीर को बदल देगा?

इस सवाल के जवाब पर आने के लिए सबसे पहले हमें यूपी के चुनावी इतिहास पर नजर डालनी होगी. खासकर 1970 के दशक की राजनीति पर. यूपी में 2014 के बाद से जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का एकछत्र राज देखा जा रहा है, उससे पहले इस तरह का राज कांग्रेस कर चुकी है. आजादी के बाद से 1967 तक देश और प्रदेश, दोनों जगह कांग्रेस का सिंगल पार्टी डॉमिनेंस देखने को मिला. कांग्रेस के इस वर्चस्व को तोड़ने वाले प्रमुख चेहरों में एक थे पश्चिमी यूपी से निकले नेता चौधरी चरण सिंह.

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चौधरी चरण सिंह के किस्से से समझिए आज के आंदोलन को

अभी के किसान आंदोलन को समझने के लिए आपको उस दौर के सियासी दृश्य को समझना होगा. ये 1967 में हुए विधानसभा चुनाव का समय था और तब 425 सीटों वाली असेंबली में कांग्रेस को 199 सीटें मिली थीं. तब बीजेपी नहीं थी बल्कि उसकी जड़ें जिल दल से निकली हैं, वो पार्टी थी यानी कि भारतीय जनसंघ और उसे 98 सीटें मिली थीं. जैसे-तैसे कांग्रेस ने बहुमत का आंकड़ा जुटाया तो चन्द्र भानु गुप्ता के CM बनने के नाम पर चौधरी चरण सिंह भड़क गए. चरण सिंह अभिलेखागार पर मौजूद चरण सिंह- अ प्रोफाइल नाम की किताब के मुताबिक आजाद भारत में यूपी की राजनीति में तब तक चौधरी चरण सिंह कई अहम मंत्रालय संभाल चुके थे.

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एक अप्रैल 1967: किताब के मुताबिक चौधरी चरण सिंह अपने 16 सहयोगियों के साथ विपक्षी खेमे में मिल गए और अपनी पार्टी का नाम रखा ‘जन कांग्रेस’. विपक्ष ने एकजुटता दिखाकर संयुक्त विधायक दल (SVD) बनाया. 3 अप्रैल 1967 को चौधरी चरण सिंह SVD के नेता चुने गए और यूपी के पहले गैर कांग्रेसी सीएम बने. यह गठबंधन भारतीय राजनीति में हुआ गजब का प्रयोग था.

जो लोग 2019 में हुए एसपी-बीएसपी गठबंधन को लेकर चौंकते हैं, उनकी जानकारी के लिए बता दें कि यूपी में तब बनी गैर कांग्रेसी सरकार में सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट, प्रजा सोशलिस्ट और जनसंघ (आज की बीजेपी से समझें) जैसी अलग-अलग राजनीतिक ध्रुवों की पार्टियां थीं.

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हालांकि यह सतरंगी प्रयोग सफल नहीं हुआ और SVD आंतरिक गतिरोध का शिकार हो गया. सरकार एक साल भी नहीं चली और यूपी में राष्ट्रपति शासन लग गया. पर चौधरी चरण सिंह अपनी ताकत दिखा चुके थे.

क्या थी चौधरी चरण सिंह की ताकत, जो महापंचायत के बहाने आई याद?

चरण सिंह- अ प्रोफाइल किताब के मुताबिक, दिसंबर 1968 में चौधरी चरण सिंह ने भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) नाम से एक अलग पार्टी बनाई. फरवरी 1969 में मध्यावधि चुनाव हुए. चौधरी चरण सिंह की बीकेडी ने अकेले दम पर 98 सीटें जीतीं. वह कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई. तो ऐसी कौन सी ताकत थी चौधरी चरण सिंह के पास जो कांग्रेस से अलग होने के महज एक साल के भीतर वह यूपी की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत थे? यह ताकत थी अजगर और मजगर की.

असल में चौधरी चरण सिंह किसान नेता होने के साथ-साथ गजब के सोशल इंजीनियर थे. तब उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल से पश्चिमी यूपी की जाति और संप्रदाय की सियासत में एक खास सोशल इंजीनियिरिंग की थी.

यह सोशल इंजीनियरिंग थी अजगर की. अजगर यानी अहीर, जाट, गुज्जर और राजपूत जातियों की एकजुटता. बाद में चौधरी साहब ने इसमें मुस्लिमों को जोड़ते हुए इसे ‘मजगर’ बना दिया. 1990 के बाद अलग-अलग जाति समूहों की राजनीति की राह अलग-अलग हो जाने और मंडल की राजनीति में एंट्री से पहले यह पश्चिमी यूपी का ऐसा विनिंग कार्ड था, जो कभी कमजोर नहीं पड़ा.

कमजोर होते-होते 2013 के बाद पूरा ध्वस्त हो गया यह समीकरण

चौधरी चरण सिंह के बाद उनके बेटे अजीत सिंह ने पिता के दिए राजनीतिक कौशल को आगे बढ़ाने की कोशिश की. पहले मुलायम ने अलग राह पकड़ी तो इस समीकरण से यादव अलग हो गए. फिर राजपूत. अजीत सिंह ने इस पूरे समीकरण में से जाट और मुस्लिम एकजुटता को साधने की कोशिश की, लेकिन 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों ने मजगर नाम के राजनीतिक समीकरण की बची खुची ताकत को भी एक झटके में खत्म कर दिया. अब चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक वजूद के नाम पर जाट वोटों की चौधराहट ही बची थी.

फिर 2014 के रण में हुई बीजेपी की एंट्री और यह चौधराहट भी गई?

2012 के विधानसभा चुनावों पर अगर आप नजर डालें, तो सीएसडीएस लोकनीति के मुताबिक बीजेपी को महज 7 फीसदी जाट वोट मिले थे. 2014 में बीजेपी जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनावों में उतरी तो सीन बदल चुका था. एक 2013 में मुजफ्फरनगर दंगा भी हो चुका था. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 77 फीसदी जाट वोट मिले. 2019 में बीजेपी दो कदम और आगे बढ़ी और पार्टी को 91 फीसदी जाट वोट मिले. चौधरी चरण सिंह, जो 1970 के दशक में यूपी की दूसरी बड़ी राजनीतिक ताकत थे उनके बेटे अजीत सिंह अपनी सीट भी नहीं बचा सके.

अब आते हैं किसान आंदोलनों से तैयार हो रही नई सियासी पिच पर

9 महीने पहले जब नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए, तो शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह इतना लंबा खिंच जाएंगे कि यूपी चुनाव 2022 नजदीक आ जाएगा. इसी साल जनवरी में मुजफ्फनरनगर के इसी जीआईसी मैदान पर महापंचायत का आयोजन किया गया था, जिसपर रविवार का आयोजन हुआ. उस महापंचायत में किसान नेता गुलाम मोहम्मद जौला भी शामिल हुए. जौला भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक सदस्यों में एक हैं, जो सीनियर टिकैत यानी महेंद्र टिकैत के साथ आंदोलन किया करते थे.

2013 के दंगों के बाद जौला ने अपनी राह अलग कर ली थी, लेकिन जनवरी 2021 में वह जब महापंचायत में आए तो पुरानी जाट-मुस्लिम एकता की बात फिर शुरू हो गई. तब जौला ने सभा को संबोधित करते हुए दो बड़ी साफ बातें कहीं. उन्होंने कहा कि जाटों ने दो गलतियां की हैं, पहली चौधरी अजीत सिंह को चुनाव हराकर और दूसरी मुस्लिमों पर हमला कर. सभा के सन्नाटे ने तब इस बात को खामोशी से सुना था.

अब बात अल्लाहु अकबर और हर-हर महादेव के नारे की

रविवार को जब राकेश टिकैत ने मुजफ्फरनगर महापंचायत में अल्लाहु अकबर और हर-हर महादेव के नारों का जिक्र किया तो उन्होंने साथ ही साथ यह भी याद दिलाया कि सीनियर टिकैत के समय से ही ये दोनों नारे एक साथ लगते थे. साफ था कि टिकैत उस जाट-मुस्लिम एकता की पैरोकारी कर रहे थे, जिसके चर्चे 2013 से पहले से थे.

टिकैत किसान कानूनों के विरोध के संग-संग एक बार फिर पश्चिमी यूपी की सियासी तस्वीर में पुराने जातिगत गठबंधनों के सुर छेड़ते नजर आ रहे हैं. यह वही सुर हैं, जो जब अपने पूरे शबाब पर थे तो 1970 के दशक में बीजेपी की पूर्ववर्ती जनसंघ ने सत्ता का स्वाद चखा था.

2014 के बाद से पश्चिमी यूपी की सियासत में बीजेपी अजेय रही है. किसान आंदोलन से मिले मौकों ने अगर जाट-मुस्लिम एकता को हकीकत की धरातल पर उतारा और अगर 2014 के बाद बीजेपी की तरफ शिफ्ट हुए जाट वोट बैंक ने अपना रुख बदला तो निश्चित तौर पर बीजेपी की राह कठिन हो सकती है. ऐसा माना जा रहा कि पश्चिमी यूपी की करीब 100 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जिनपर किसान आंदोलन अपना असर छोड़ सकता है. इसके अलावा कई सीटों पर मुस्लिम-जाट गठजोड़ भी अजेय विनिंग फॉर्म्युला बन सकता है.

‘महापंचायत’ में बोले राकेश टिकैत- ‘लगते रहेंगे अल्लाहु-अकबर और हर-हर महादेव के नारे’

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