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Mood kya hai Sonbhadra: क्या सोनभद्र में 2027 में हैट्रिक लगा पाएगी BJP? पत्रकारों ने बता दिया पूरी समीकरण

Mood Kya Hai Sonbhadra: सोनभद्र की चारों विधानसभा सीटों पर 2027 चुनाव से पहले बीजेपी की राह मुश्किल दिख रही है. आदिवासी असंतोष, जमीन मुआवजा, बेरोजगारी और स्थानीय विधायकों से नाराजगी पार्टी की चुनौती बढ़ा रही है.

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Mood kya hai Sonbhadra
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Mood kya hai Sonbhadra: उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल और औद्योगिक महत्व वाले सोनभद्र जिले में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी माहौल गरमाने लगा है. 2017 और 2022 के चुनावों में लगातार जिले की चारों सीटों (सदर, घोरावल, ओबरा और दुद्धी) पर दबदबा बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए इस बार राह आसान नहीं दिख रही है.

यूपी Tak के खास कार्यक्रम 'मूड क्या है' में जिले के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ हुई गहन चर्चा में यह बात सामने आई है कि स्थानीय विधायकों के प्रति नाराजगी, किसानों की जमीनों का मुआवजा विवाद, बेरोजगारी और हावी होती अफसरशाही के चलते इस बार भाजपा के सामने अपना पुराना प्रदर्शन दोहराने की कड़ी चुनौती है.

जल-जंगल-जमीन को लेकर आदिवासियों में आक्रोश

वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक सोनभद्र में प्रस्तावित विंध्य एक्सप्रेस-वे, ग्रीनको और अडानी जैसे बड़े औद्योगिक व बिजली प्रोजेक्ट्स के लिए जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है.

कम मुआवजा: स्थानीय किसानों और आदिवासियों का आरोप है कि बाजार दर के मुकाबले उन्हें बहुत कम मुआवजा दिया जा रहा है.

रोजगार की गारंटी नहीं: बड़े प्रोजेक्ट्स आने के बावजूद स्थानीय युवाओं को नौकरियों में प्राथमिकता नहीं मिल रही है, जिससे पलायन जारी है.

असंतोष: आदिवासियों में जल, जंगल और जमीन छिनने को लेकर गहरा असंतोष है, जो चुनाव में एक बड़ा फैक्टर बन सकता है.

मोदी-योगी मैजिक के भरोसे विधायक

जिले के पत्रकारों का मानना है कि स्थानीय विधायकों के पास अपने गिनाने लायक 5 बड़े काम भी नहीं हैं.'विधायक सिर्फ योगी-मोदी के चेहरे और मैजिक के भरोसे चुनाव जीतते आए हैं. लेकिन हर बार केवल शीर्ष नेतृत्व का मैजिक नहीं चलता, जनता धरातल पर स्थानीय विकास और जनप्रतिनिधियों की उपलब्धता भी देखती है.' इसके अलावा संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और अधिकारियों के हावी होने के कारण कार्यकर्ताओं में निष्क्रियता देखी जा रही है.

क्या रहेगा 2027 में सियासी गणित?

वरिष्ठ पत्रकारों की राय में इस बार मुकाबला 50-50 का दिख रहा है.

ब्राह्मण और पीडीए समीकरण: बदले राजनीतिक हालातों में फॉरवर्ड (ब्राह्मण) वोटरों की भूमिका भी अहम हो रही है जिन्हें साधने की कोशिशें जारी हैं.

स्थानीय बनाम राष्ट्रीय मुद्दे: सड़क, कानून-व्यवस्था और बिजली जैसी सुविधाएं बेहतर हुई हैं.लेकिन भ्रष्टाचार (तहसील और बिजली विभाग की मनमानी) से आम जनता त्रस्त है.

पत्रकारों का निष्कर्ष है कि यदि भाजपा प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से किसानों की मुआवजा समस्या को समय रहते हल कर लेती है और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर कर लेती है तो वह अपना किला बचा सकती है. वरना चारों सीटों पर कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा.