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Mood kya hai Bhadohi: भदोही में सपा-बीजेपी के सामने क्या होगी असली चुनौती, पत्रकारों ने खुलकर बता दिया

भदोही में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी मुकाबला रोचक है. तीनों सीटों पर जातीय समीकरण, स्थानीय बनाम बाहरी प्रत्याशी, विकास के मुद्दे और Gen Z वोटर्स का बदलता रुख चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है.

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Akhilesh Yadav and CM Yogi
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Mood kya hai Bhadohi: उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर है. तीन सीटों वाले इस जिले में जहां भदोही विधानसभा पर समाजवादी पार्टी (सपा) का कब्जा है.  ज्ञानपुर में निषाद पार्टी का परचम लहरा रहा है. वहीं औराई (सुरक्षित) सीट भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खाते में है. हालांकि पिछले चुनावों में महज 1500 से 5000 वोटों के बेहद नॉमिनल अंतर से हुए हार-जीत के आंकड़े यह साफ बयां करते हैं कि इस बार तीनों ही प्रमुख दलों के लिए मुकाबला बिल्कुल आसान नहीं रहने वाला है. भदोही के वरिष्ठ पत्रकारों और संवाददाताओं का मानना है कि इस बार स्थानीय मुद्दे, जातियों की बिसात, बाहरी बनाम स्थानीय प्रत्याशी का मुद्दा और Gen Z वोटर्स का बदला मिजाज जिले के पूरे चुनावी समीकरण को बदल सकता है.

बीजेपी के सामने प्रत्याशी चुनने की चुनौती

भदोही विधानसभा सीट पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी का गढ़ मानी जाती रही है. वर्तमान विधायक जाहिद बेग को सपा एक बार फिर मैदान में उतार सकती है और उनका दावा इस बार भी काफी मजबूत दिखाई दे रहा है.

समीकरण और चुनौती: पिछली बार बीजेपी के प्रत्याशी रहे रवींद्रनाथ त्रिपाठी का स्थानीय स्तर पर विरोध देखने को मिला था, जिसका सीधा फायदा सपा को हुआ था.

नया फैक्टर: जिला पंचायत सदस्य अमित सिंह प्रिंस की चुनावी सक्रियता बीजेपी के सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगा सकती है. यदि वे किसी अन्य दल से किस्मत आजमाते हैं तो सपा को इसका अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा चुनावी लाभ मिल सकता है.

ज्ञानपुर सीट: बाहुबल का असर कम, विकास के मुद्दे पर केंद्रित होगी लड़ाई

ज्ञानपुर विधानसभा सीट पर फिलहाल निषाद पार्टी के विपुल दुबे विधायक हैं. पूर्व में इस सीट पर बाहुबली विजय मिश्रा का दबदबा रहा है. लेकिन अब स्थिति बदल रही है.

जातीय ताना-बाना: इस सीट पर ब्राह्मण और बिंद मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं. चर्चा यह भी है कि विजय मिश्रा की पुत्री भी सपा के टिकट से ताल ठोक सकती हैं.

विकास का रिपोर्ट कार्ड

डिग्री कॉलेज को यूनिवर्सिटी का दर्जा दिलवाने और गंगा नदी पर बन रहे पुलों का श्रेय विपुल दुबे को मिल रहा है. युवा अब बाहुबल और माफिया संस्कृति से इतर विकास और सुलभ उपलब्धता वाले नेताओं को पसंद कर रहे हैं.

औराई सीट: महज 1,600 वोटों का अंतर और बीजेपी के लिए साख बचाने की जंग

औराई (सुरक्षित) सीट पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता और चार बार के विधायक दीनानाथ भास्कर का कब्जा है. पिछली बार उन्होंने महज 1,647 वोटों के मामूली अंतर से चुनाव जीता था.

बसपा का कोर वोट बैंक: पिछली बार बसपा प्रत्याशी को लगभग 28,000 वोट मिले थे. यदि बसपा इस बार सही जातीय समीकरण बैठाकर प्रत्याशी उतारती है तो चुनाव सीधे तौर पर त्रिकोणीय हो जाएगा.

जनता की नाराजगी: औराई में लंबे समय से बंद पड़ी चीनी मिल, बदहाल इंदिरा मिल और माधव सिंह आरओबी (ROB) जैसी बुनियादी समस्याएं अब भी जस की तस हैं. स्थानीय जनता का मानना है कि वर्तमान विधायक अपने वर्ग और क्षेत्रीय विकास को पार्टी से प्रभावी ढंग से नहीं जोड़ पाए हैं.

'Gen Z' और स्थानीय प्रत्याशी का मुद्दा रहेगा हावी

जिले में लंबे समय से दूसरे दलों से आए नेताओं और बाहरी प्रत्याशियों को टिकट दिए जाने से पार्टी के मूल और निष्ठावान कार्यकर्ताओं में अंदरूनी टीस है. इसके साथ ही 2014-17 के बाद राजनीति को समझने वाली नई पीढ़ी (Gen Z) अब धर्म और राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर शिक्षा, रोजगार, स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर और कारखानों को पुनर्जीवित करने के मुद्दे पर वोट देने का मन बना रही है.

जन समस्याओं का अंबार: तहसीलों और थानों में आम आदमी की सुनवाई न होना और जनप्रतिनिधियों द्वारा समस्याओं का समाधान करने के बजाय केवल सोशल मीडिया का सहारा लेना भी जनता के बीच असंतोष पैदा कर रहा है.

कुल मिलाकर भदोही में किसी भी पार्टी की राह सीधी नहीं है. प्रत्याशियों के सही चयन, युवाओं के मिजाज और बसपा के प्रदर्शन पर ही भदोही की तीनों विधानसभा सीटों की जीत-हार का दारोमदार टिकेगा.

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