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Opinion: संविधान की दुहाई, कानून की अनदेखी! सहारनपुर पर सपा की वोटबैंक सियासत का सच

Opinion: सहारनपुर में सरकारी जमीन पर बने अवैध निर्माण पर हुई कार्रवाई के बाद जिस तरह समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत विपक्षी दल सक्रिय हुए हैं, उसने एक पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है कि क्या अब हर कानूनी कार्रवाई को धार्मिक चश्मे से देखकर राजनीति की जाएगी?

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Saharanpur Mosque Demolition
Saharanpur Mosque Demolition News (Photo AI Generated)
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Opinion: सहारनपुर में सरकारी जमीन पर बने अवैध निर्माण पर हुई कार्रवाई के बाद जिस तरह समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत विपक्षी दल सक्रिय हुए हैं, उसने एक पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है कि क्या अब हर कानूनी कार्रवाई को धार्मिक चश्मे से देखकर राजनीति की जाएगी?

मामला सरकारी जमीन पर बने अवैध निर्माण का था. अदालत की प्रक्रिया पूरी होने और मस्जिद प्रबंधन समिति की अपील जिला जज की अदालत से खारिज होने के बाद प्रशासन ने ये कदम उठाया था. इसके बावजूद कार्रवाई को विपक्ष सीधे धार्मिक उत्पीड़न के नैरेटिव में बदलने की कोशिश कर रहा है.

अदालत के फैसले के बाद भी सियासत क्यों?

किसी भी लोकतंत्र में सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है. लेकिन सवाल यह है कि जब किसी मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी हो, तब क्या राजनीतिक दल अदालत के फैसले से असहमति को धार्मिक भावनाओं के सवाल में बदल सकते हैं?

सहारनपुर में यही होता दिखाई दे रहा है. अगर निर्माण अवैध था, जमीन सरकारी थी और कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई, तो विपक्ष को इस बात पर बहस करनी चाहिए कि कानून सही तरीके से लागू हुआ या नहीं. लेकिन राजनीतिक बयानबाजी में कार्रवाई को केवल ‘मस्जिद’ के रूप में पेश करने से ऐसा लगता है कि असली मुद्दे को पीछे धकेलकर भावनात्मक मुद्दा आगे किया जा रहा है.

समाजवादी पार्टी के लिए यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी राजनीति लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर टिकी रही है. ऐसे में सहारनपुर जैसे मामले में कानून और अदालत की प्रक्रिया से ज्यादा धार्मिक पहचान पर जोर देना महज संयोग नहीं माना जा सकता.

संविधान का दिखावा लेकिन कानूनी फैसले पर विरोध

सबसे दिलचस्प विरोधाभास विपक्ष की राजनीति में यही है. सपा, कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल हाथ में संविधान की किताब लेकर सरकार को घेरते हैं. लेकिन जब कोई अदालती फैसला उनके वोट बैंक को चोट करता है तो फिर वो खुद ही संविधान, कानून और नियमों को नहीं मानते और उसे धर्म के चश्मे से देखने लगते हैं. उन्हें ये समझना चाहिए कि संविधान केवल भाषण देने या हाथ में किताब रखने का नाम नहीं है. संविधान का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत कानून का शासन है.

अगर विपक्ष को लगता है कि कार्रवाई गलत थी, तो उसके पास कानूनी और संवैधानिक रास्ते मौजूद हैं. लेकिन अदालत की प्रक्रिया के बाद भी सड़क और राजनीतिक मंचों पर धार्मिक नैरेटिव खड़ा करना उस व्यवस्था को कमजोर करता है, जिसकी दुहाई विपक्ष खुद देता है.

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित ढांचा कलेक्ट्रेट परिसर की जमीन पर बना था. इतना ही नहीं, परिसर के कुछ हिस्सों के व्यावसायिक इस्तेमाल और किराया वसूले जाने की बात भी सामने आई है. ऐसे में असली सवाल यह है कि सरकारी जमीन का इस्तेमाल किस अधिकार से किया जा रहा था? अगर सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण हुआ था, तो कार्रवाई का पैमाना धर्म नहीं बल्कि कानून होना चाहिए.

सहारनपुर को फिर सियासी प्रयोगशाला बनाने की कोशिश?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक संवेदनशीलता किसी से छिपी नहीं है. ऐसे क्षेत्र में किसी कानूनी कार्रवाई को धार्मिक संघर्ष के रूप में पेश करना बेहद गैर-जिम्मेदाराना राजनीति हो सकती है.

सपा और कांग्रेस को यह समझना होगा कि विपक्ष का काम हर कार्रवाई को गलत बताना नहीं, बल्कि सरकार से तथ्यों के आधार पर जवाब मांगना है. अगर हर अवैध निर्माण पर कार्रवाई को धार्मिक मुद्दा बना दिया जाएगा, तो फिर कानून के निष्पक्ष होने की उम्मीद कैसे की जाएगी? सहारनपुर में असली लड़ाई मस्जिद बनाम सरकार की नहीं होनी चाहिए. असली सवाल कानून बनाम अवैध कब्जे का होना चाहिए.

(लेखक डॉ. अभय पाण्डेय दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)