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Opinion: गांधी-शास्त्री के विचारों में आत्मनिर्भर और सशक्त भारत की राह

Opinion: दो अक्टूबर भारत के लिए केवल महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती का दिन नहीं है. यह उन मूल्यों को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा तय की.

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दो अक्टूबर भारत के लिए केवल महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती का दिन नहीं है. यह उन मूल्यों को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा तय की. गांधी ने भारत की आजादी को केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं माना. उनके लिए आजादी का अर्थ, स्वराज्य था और स्वराज्य की अंतिम परिणति थी ग्राम स्वराज्य. शास्त्री ने स्वतंत्र भारत के कठिन दौर में ‘जय जवान, जय किसान’ का मंत्र दिया. दोनों की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन उनके विचारों के बीच एक गहरा संबंध था. सामान्य भारतीय को राष्ट्र निर्माण के केंद्र में रखना और सार्वजनिक जीवन को सेवा, सादगी, श्रम तथा जिम्मेदारी से जोड़ना. गांधी और शास्त्री का संबंध केवल इतना नहीं है कि दोनों का जन्मदिन एक ही दिन पड़ता है. शास्त्री उस राजनीतिक पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसे गांधी के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन ने गहराई से प्रभावित किया था. गांधी के लिए राजनीति सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज के जीवन में परिवर्तन का साधन थी. शास्त्री ने स्वतंत्र भारत में सार्वजनिक जीवन को सादगी, अनुशासन और कर्तव्य बोध के साथ आगे बढ़ाया. वे गांधी के विचारों की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं थे, लेकिन गांधी द्वारा निर्मित राष्ट्रीय राजनीतिक संस्कार की एक महत्वपूर्ण कड़ी अवश्य थे. गांधी ने स्वराज्य को केवल सत्ता परिवर्तन नहीं माना. उनके लिए स्वराज्य व्यक्ति के आत्मानुशासन, समाज की नैतिक शक्ति और जनता की सक्रिय भागीदारी से जुड़ा था. उनका विश्वास था कि भारत का पुनर्निर्माण गांवों के पुनर्निर्माण के बिना संभव नहीं है लेकिन गांधी गांव को उसकी गरीबी, अशिक्षा, रूढ़ियों और सामाजिक बुराइयों के साथ स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे. उनका लक्ष्य गांव का पुनर्निर्माण था. वह ऐसे गांव की कल्पना करते थे, जो स्वशासित, स्वावलंबी, सहयोगी और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो. इसलिए गांधी का ग्राम स्वराज्य केवल पंचायत बना देने का नाम नहीं था. उसमें मनुष्य की गरिमा, श्रम का सम्मान, समानता, ट्रस्टीशिप, विकेंद्रीकरण, स्वदेशी, स्वावलंबन, सहयोग, सत्याग्रह, सर्वधर्म समानता, पंचायती राज और नई तालीम जैसे विचार भी जुड़े हुए थे. इनमें कुछ जीवन-मूल्य हैं, कुछ सामाजिक व्यवहार के सिद्धांत और कुछ शासन-व्यवस्था की बुनियादी अवधारणाएं हैं. इसलिए ग्राम स्वराज्य को केवल पंचायती राज के प्रशासनिक ढांचे में सीमित कर देना, गांधी की व्यापक कल्पना को छोटा कर देना होगा. ग्राम स्वराज्य का केंद्र प्रशासन नहीं है, बल्कि मनुष्य और उसकी भागीदारी है. आज का गांव गांधी के समय का गांव नहीं है. इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने गांव को दुनिया से जोड़ दिया है. युवा नई आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ रहे हैं, महिलाएं स्थानीय शासन में नेतृत्व कर रही हैं और गांवों में नए उद्यम तथा रोजगार के अवसर विकसित हो रहे हैं. इसलिए ग्राम स्वराज्य का स्वरूप भी बदलना स्वाभाविक है. आज इसका अर्थ पुराने गांव को उसी रूप में वापस लाना नहीं, बल्कि आधुनिक गांव को अधिक सक्षम, स्वावलंबी, लोकतांत्रिक, न्यायपूर्ण और खुशहाल बनाना है. मानव गरिमा, समानता, श्रम, सहयोग और विकेंद्रीकरण जैसे उसके मूल मूल्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं. भारत ने पंचायती राज को संवैधानिक आधार देकर इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है लेकिन पंचायत का गठन ही ग्राम स्वराज्य नहीं है. वास्तविक ग्राम स्वराज्य तब होगा, जब पंचायतों के पास उनके दायित्वों के अनुरूप अधिकार और संसाधन हों, वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले सकें और ग्राम सभा गांव के सामूहिक निर्णय का प्रभावी मंच बने.