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Opinion: सनातन सम्मान की बात, लेकिन राजकुमार भाटी पर चुप्पी... सपा के 'नए अवतार' पर बौद्ध दीक्षा प्रकरण से उठे सवाल

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव की ओर से सनातन के सम्मान की बात करने और सपा नेताओं के सनातनी वेशभूषा में नजर आने के बीच प्रवक्ता राजकुमार भाटी का 22 प्रतिज्ञाएं लेने वाला वीडियो चर्चा में है. इस घटनाक्रम ने सपा की नई राजनीतिक छवि, धार्मिक स्वतंत्रता और पार्टी नेतृत्व की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं.

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Opinion: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इससे पहले मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने पीडीए का नारा दिया है. इसके साथ ही अखिलेश यादव की राजनीति में एक नया रंग भी दिखाई दे रहा है. वह लगातार मंचों से सनातन के सम्मान की बात कर रहे हैं और सनातनी वेशभूषा में नजर आ रहे हैं. यहां तक कि सपा के कई मुस्लिम नेता भी सनातनी चोला ओढ़े नजर आ रहे हैं. चुनाव से पहले सपा की इस रणनीति को राजनीतिक लिहाज से अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलने और हिंदू मतदाताओं को साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

लेकिन सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी का हाल ही में बौद्ध दीक्षा समारोह में 22 प्रतिज्ञाएं लेना अखिलेश यादव की इन कोशिशों पर पानी फेरने वाला साबित हो रहा है. सामने आए वीडियो में भाटी हिंदू देवी-देवताओं को भगवान न मानने और उनकी पूजा नहीं करने संबंधी प्रतिज्ञाएं लेते दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि सपा की नई राजनीतिक छवि उसके नेताओं के व्यवहार में भी दिखाई देती है या फिर यह केवल चुनावी जरूरतों के हिसाब से गढ़ी जा रही रणनीति है.

भाटी का विवादों से पुराना नाता है

यह पहली बार नहीं है, जब राजकुमार भाटी के बयान को लेकर विवाद खड़ा हुआ है. इससे पहले भी वह कई मौकों पर सनातन परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं को लेकर विवादों में रहे हैं. ब्राह्मण समाज को लेकर उनकी हालिया टिप्पणी के बाद काफी विवाद हुआ था. इसके बाद जाट समाज और गुर्जर महिलाओं को लेकर उनके बयानों ने भी सवाल खड़े किए. अब बौद्ध दीक्षा समारोह में 22 प्रतिज्ञाएं लेने के मामले ने एक बार फिर उन्हें विवादों के केंद्र में ला दिया है.

अखिलेश के इशारे पर बोल रहे हैं भाटी?

यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है, क्योंकि राजकुमार भाटी लंबे समय से विवादों में रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद सपा की ओर से उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई सामने नहीं आई है. ब्राह्मण समाज को लेकर विवादित बयान के बाद अखिलेश यादव ने उन्हें लखनऊ बुलाया था, लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. इसके बाद भी जाट समाज और गुर्जर महिलाओं को लेकर उनके बयान सामने आए. वहीं, सपा के कई बड़े नेता भी भाटी के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं.

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर पार्टी नेतृत्व उनके बयानों पर लगाम क्यों नहीं लगा पा रहा है? क्या भाटी अपने स्तर पर बयान दे रहे हैं या उन्हें पार्टी नेतृत्व का संरक्षण हासिल है? 

श्यामलाल पाल का तर्क और अधूरा रह जाने वाला सवाल

सपा प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल का कहना है कि राजकुमार भाटी को अपनी मान्यताओं के अनुसार आचरण करने का अधिकार है. उनके इस बयान को भाटी के समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है. इस बात में कोई दो राय नहीं है कि भारत में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था चुनने, उसका पालन करने और किसी धर्म को नहीं मानने की स्वतंत्रता है. किसी व्यक्ति को उसकी निजी मान्यताओं के लिए निशाना बनाना भी उचित नहीं है.

लेकिन इस तर्क का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है. ईश्वर को नहीं मानना एक व्यक्तिगत विचार है और किसी धार्मिक मान्यता से असहमत होना वैचारिक स्वतंत्रता का हिस्सा है. मगर क्या इस स्वतंत्रता के नाम पर दूसरे धर्म की आस्थाओं और प्रतीकों का अपमान करने को भी उचित ठहराया जा सकता है? यही वह बुनियादी सवाल है, जिसका जवाब केवल अधिकारों की दुहाई देकर नहीं दिया जा सकता.

धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ दूसरों की आस्था को अपमानित करने की छूट नहीं है. किसी व्यक्ति को अपनी मान्यताओं के अनुरूप जीवन जीने का अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उसे अपने शब्दों और व्यवहार के प्रभाव की जिम्मेदारी भी समझनी होगी. ऐसे में सवाल यह भी है कि हिंदू देवी-देवताओं को लेकर सामने आए इस प्रकरण पर सपा कोई सख्त कदम क्यों नहीं उठा सकी?

चुनावी छवि नहीं, आचरण से साबित होगा सनातन-प्रेम

सपा के सामने असली चुनौती अपनी घोषित राजनीतिक सोच और संगठनात्मक व्यवहार के बीच सामंजस्य स्थापित करने की है. धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान और दूसरे की आस्था के प्रति संवेदनशीलता साथ-साथ चल सकते हैं. इनमें से किसी एक को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना सामाजिक सद्भाव के हित में नहीं है.

राजकुमार भाटी का ताजा प्रकरण अखिलेश यादव के सामने यह सवाल खड़ा करता है कि पार्टी सार्वजनिक जीवन में धार्मिक और सामाजिक सम्मान की कौन-सी मर्यादा स्वीकार करती है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में नारों और छवियों से आगे बढ़कर नेताओं का आचरण भी जवाबदेही का विषय है. सपा के 'नए सनातन-प्रेमी' चोले की विश्वसनीयता भी इसी कसौटी पर परखी जाएगी. यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सपा की राजनीति और उसके पुराने बयानों को लेकर सनातन के प्रति उसके रुख पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं.

(लेखक, डॉ. अश्वनी अवस्थी, पीएचडी (भूगोल) हैं. वे समसामयिक विषयों एवं सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)