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Opinion: धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर गरम, लेकिन हिंदू देवी-देवताओं को गाली देने वाले अपने नेताओं पर नरम... सनातन पर सपा का दोहरा स्टैंड

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव इन दिनों सनातन, भगवान राम और भगवान कृष्ण के मुद्दे पर बीजेपी को घेर रहे हैं. धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर उनके विरोध के बीच अब सपा नेताओं के पुराने और हालिया बयानों को लेकर सवाल उठ रहे हैं. मिर्जापुर के पूर्व जिलाध्यक्ष शिवशंकर यादव और सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी के बयानों का हवाला देते हुए पार्टी के रुख पर सवाल उठाए जा रहे हैं. ऐसे में चर्चा है कि क्या सनातन के मुद्दे पर सपा का विरोध चुनिंदा है और क्या पार्टी अपने नेताओं के विवादित बयानों पर भी वैसी ही सख्ती दिखाएगी?

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Opinion: उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी इन दिनों सनातन के मुद्दे पर मुखर है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार बीजेपी को घेर रहे हैं और सनातन से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं. इन दिनों वह कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री को लेकर मोर्चा खोले हुए हैं. भगवान श्रीकृष्ण को लेकर दिए गए धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर अखिलेश यादव कह रहे हैं कि उन्हें यूपी में घुसने नहीं देना चाहिए. वहीं, सपा दफ्तर के बाहर पोस्टर लगाए गए हैं कि राम और कृष्ण को बांटने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. लेकिन पिछले कुछ दिनों से सपा जिस तरह सनातन की पैरोकार बन रही है, उसे लेकर गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं.

दरअसल, सपा के इस बदले अंदाज पर सवाल उठना इसलिए लाजिमी है, क्योंकि सपा प्रमुख राम-कृष्ण और धीरेंद्र शास्त्री को लेकर बीजेपी पर तो निशाना साध रहे हैं, लेकिन जब उनकी पार्टी के भीतर से ही सनातन को गाली देने के मामले सामने आते हैं, तो अखिलेश यादव कोई एक्शन नहीं लेते, बल्कि ऐसे नेताओं को प्रोत्साहित करते हैं.

इससे एक और सवाल भी जुड़ता है. क्या यही कसौटी समाजवादी पार्टी के अपने नेताओं और पदाधिकारियों पर भी लागू होती है? क्या पार्टी नेतृत्व अपने नेताओं के विवादित बयानों पर भी उतनी ही स्पष्टता और तत्परता दिखाता है, जितनी दूसरे लोगों के बयानों पर दिखाई देती है?

मिर्जापुर से लेकर भाटी तक... पार्टी नेतृत्व से सवाल

हाल ही में मिर्जापुर में सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष शिवशंकर यादव का एक वीडियो सामने आया. इसमें वह शादी-विवाह के दौरान बोले जाने वाले मंत्रों और ब्राह्मणों की कर्मकांड परंपराओं को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करते नजर आ रहे हैं. इस मामले के सामने आने के बाद अखिलेश यादव वाराणसी गए, लेकिन उन्होंने या उनकी पार्टी की ओर से शिवशंकर यादव को लेकर कोई सख्त टिप्पणी नहीं की गई.

इसी तरह सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी लगातार सनातन को अपमानित कर रहे हैं. पहले उन्होंने ब्राह्मणों पर अभद्र टिप्पणी की. फिर उनका एक वीडियो सामने आया, जिसमें वह हिंदू देवी-देवताओं की पूजा नहीं करने से जुड़ी प्रतिज्ञा दोहराते दिखाई दिए. लेकिन सपा की ओर से भाटी पर कोई एक्शन नहीं लिया गया. बल्कि, उल्टा अखिलेश यादव ने उन्हें लखनऊ बुलाकर उनकी पीठ थपथपाई.

सपा नेताओं के सनातन के प्रति व्यवहार से जुड़े केवल यही दो मामले नहीं हैं. कई नेताओं ने सनातन को अपमानित किया है. स्वामी प्रसाद मौर्य भी जब सपा में थे, तब रामचरितमानस जलाते थे, लेकिन अखिलेश ने तब भी उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दूसरों के बयानों पर इतने गरम रहने वाले अखिलेश अपने नेताओं पर इतने नरम क्यों हैं? क्या यह सनातन के प्रति दोहरा स्टैंड नहीं है? क्या सनातन के मुद्दे पर वे राजनीति नहीं कर रहे हैं? क्या उनका विरोध सेलेक्टिव नहीं है?

राम मंदिर और कृष्ण जन्मभूमि पर भी स्पष्टता जरूरी

समाजवादी पार्टी की राजनीति में अयोध्या का राम मंदिर और मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि लंबे समय से विवाद और राजनीतिक बहस के विषय रहे हैं. मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में अयोध्या आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर चली गोली की घटना आज भी सपा की राजनीतिक विरासत पर चर्चा में उठाई जाती है. वहीं, कृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे पर भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का स्पष्ट और सुसंगत रुख जानने की मांग समय-समय पर उठती रही है. ऐसे में जब अखिलेश यादव भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम के सम्मान की बात करते हैं, तो उनके पुराने राजनीतिक रुख और वर्तमान बयानों के बीच संबंध पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

अखिलेश यादव को यह स्पष्ट करना होगा कि उनकी पार्टी में धार्मिक आस्था के सम्मान को लेकर क्या मानक हैं. यदि भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण पर टिप्पणी उन्हें अस्वीकार्य है, तो अपने नेताओं से जुड़े विवादों पर भी स्पष्ट जवाब और उचित कार्रवाई की अपेक्षा की जाएगी. किसी भी दल की विश्वसनीयता केवल उसके विरोधियों पर उठाए गए सवालों से नहीं, बल्कि अपने संगठन के भीतर उठे सवालों पर दिए गए जवाबों से भी तय होती है. सनातन, राम और कृष्ण के सम्मान की बात हो, तो कसौटी व्यक्ति या पार्टी की पहचान देखकर नहीं बदलनी चाहिए.

(लेखक, डॉ. विनम्र सेन सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक और सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं.)

Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.