हाथरस जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर क्या है जनता का मूड? पत्रकारों ने समझा दिया

राजेश सिंघल

• 12:10 PM • 30 Oct 2026

हाथरस की तीनों विधानसभा सीटों पर 2027 चुनाव से पहले क्या है जनता का मूड? विधायकों से नाराजगी, अधूरे विकास कार्य, जातीय समीकरण और बदलते गठबंधन ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है. जानिए हाथरस का पूरा सियासी गणित और जमीनी हकीकत.

Mood kya hai Hathras

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Mood kya hai Hathras: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले यूपी Tak की टीम ने हाथरस जिले के राजनीतिक मिजाज को टटोला है. हाथरस जिले के अंतर्गत कुल तीन विधानसभा सीटें आती हैं-हाथरस (सुरक्षित), सादाबाद और सिकंदराऊ. साल 2022 के चुनावों में जहां बीजेपी ने दो सीटों पर कब्जा जमाया था. वहीं एक सीट पर आरएलडी (उस समय सपा समर्थित) ने जीत दर्ज की थी. हालिया लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी ने यहां बढ़त बनाई थी. लेकिन धरातल पर स्थानीय विधायकों से नाराजगी, जनता से दूरी, विकास कार्यों की रफ्तार और यूजीसी व पेपर लीक जैसे राष्ट्रीय-क्षेत्रीय मुद्दों ने इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प बना दिया है. स्थानीय पत्रकारों और जनता के बीच चर्चा के आधार पर जानिए क्या कहते हैं यहां के सियासी समीकरण.

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हाथरस (सुरक्षित) विधानसभा: पैराशूट प्रत्याशी और जनता की नाराजगी

हाथरस सदर सीट पर लंबे समय से यह चर्चा आम रही है कि राजनीतिक दल अक्सर बाहर (आगरा या अलीगढ़) से आकर पैराशूट प्रत्याशी उतार देते हैं जिससे जनता और जनप्रतिनिधि के बीच दूरी बनी रहती है. वर्तमान विधायक अंजुला सिंह महौर को लेकर भी स्थानीय स्तर पर यह बात सामने आई है कि वे जनता के बीच सीधे संपर्क में कम रहती हैं और उनकी सक्रियता मुख्य रूप से सरकारी या पार्टी मंचों तक सीमित रही है. इसके अलावा कुछ जमीनी विवादों को लेकर भी चर्चाएं रहीं.

इस सीट पर पूर्व आईपीएस अधिकारी आदित्य प्रकाश वर्मा के समाजवादी पार्टी में शामिल होने और संभावित उम्मीदवारी की चर्चा ने सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है जिससे इस बार बीजेपी के लिए राह उतनी आसान नहीं दिख रही जितनी पहले हुआ करती थी.

सिकंदराऊ विधानसभा: विकास के दावों और जनता की उम्मीदों के बीच फासला

सिकंदराऊ सीट से भाजपा के विधायक वीरेंद्र सिंह राणा दो बार से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं. लेकिन स्थानीय स्तर पर जनता और कार्यकर्ताओं में इस बात की नाराजगी है कि चुनाव जीतने के बाद नेताजी क्षेत्र से गायब रहते हैं.

क्षेत्र की एक बड़ी मांग-काली नदी पर पुल का निर्माण लगभग 40 साल पुरानी थी जिसका शिलान्यास कार्यकाल के अंत में हुआ. इसके अलावा कई ग्रामीण इलाकों में सड़कों की बदहाली और प्रशासनिक अधिकारियों के मनमाने रवैये (भ्रष्टाचार) को लेकर जनता में असंतोष देखा जा रहा है. हालांकि क्षेत्र में ठाकुर, यादव, बघेल और वैश्य मतदाताओं की संख्या मजबूत होने के कारण यहां मुकाबला हमेशा कांटे का रहा है.

सादाबाद विधानसभा: आरएलडी-भाजपा गठबंधन और स्थानीय मुद्दे

सादाबाद सीट पर वर्तमान विधायक गुड्डू चौधरी (आरएलडी से) हैं जिन्होंने पिछला चुनाव सपा के समर्थन से जीता था. इस बार आरएलडी एनडीए (भाजपा) के साथ है जिससे समीकरण बदल चुके हैं.

स्थानीय लोगों और पत्रकारों के अनुसार, यहां भी विधायक के जनता के बीच सक्रिय न रहने और मूलभूत समस्याओं (जैसे पीने के पानी की किल्लत और खारे पानी की समस्या) का समाधान न होने को लेकर नाराजगी है.

इसके अलावा पार्टी के भीतर ही टिकट के कई नए दावेदार सामने आ रहे हैं. यदि सीट बंटवारे और स्थानीय चेहरों पर समीकरण बिगड़े तो यहां त्रिकोणीय या कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है.

जातीय समीकरण और उभरते राजनीतिक दल

हाथरस के चुनावी ताने-बाने में दलित, ब्राह्मण, वैश्य, जाट और ठाकुर मतदाताओं की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है. पारंपरिक रूप से भाजपा और बसपा का यहां मजबूत जनाधार रहा है. लेकिन इस बार स्थानीय स्तर पर नाराजगी और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ-साथ कुछ नए राजनीतिक मोर्चों व दलों की हलचल भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है.कुल मिलाकर 2027 के चुनाव में यहां सत्ताधारी दल को कड़ी टक्कर मिलने के पूरे आसार हैं.

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