उत्तर प्रदेश की राजनीति में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच का विवाद अब एक नया मोड़ ले चुका है. सीएम योगी आदित्यनाथ के कड़े रुख के बाद भाजपा ने 'डैमेज कंट्रोल' के लिए अपनी रणनीति बदल दी है. संकेतों और विधानसभा में पिछले दिन दिए गए बयानों ये साफ समझ में आया कि सीएम योगी आदित्यनाथ ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के मामले में झुकने से साफ इनकार कर दिया है. उन्होंने सदन में स्पष्ट किया कि कोई भी खुद को शंकराचार्य घोषित नहीं कर सकता और कानून से ऊपर कोई नहीं है. माघ मेले के दौरान अविमुक्तेश्वरानंद और बटुकों के साथ हुए व्यवहार को लेकर उपजे विवाद पर ऐसा लगा कि मुख्यमंत्री ने कोई भी समझौता करने से मना कर दिया है.
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सीएम योगी के सख्त रुख को देखते हुए भाजपा ने ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने के लिए दूसरा रास्ता अपनाया है. डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने 101 बटुक ब्राह्मणों का सम्मान किया और उनके शिखा पूजन कार्यक्रम में हिस्सा लिया. बृजेश पाठक और भाजपा के वरिष्ठ नेता लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने बटुकों की शिखा (चोटी) खींचे जाने को 'महापाप' करार दिया और प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाए, हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री के खिलाफ कुछ नहीं कहा. शंकराचार्य ने वाराणसी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा की इस रणनीति पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि भाजपा बटुकों की बात तो कर रही है, लेकिन उनके (शंकराचार्य के) अपमान पर चुप क्यों है?
उन्होंने डिप्टी सीएम और अन्य मंत्रियों को 'हाथी के दिखाने वाले दांत' की संज्ञा देते हुए कहा कि वे मुख्यमंत्री के सामने बेबस हैं और कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं. इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने लखनऊ में मुख्यमंत्री और दोनों उप-मुख्यमंत्री के साथ बैक-टू-बैक बैठकें की हैं. संघ इस बात को लेकर चिंतित है कि ब्राह्मणों की नाराजगी या आंतरिक विवाद 2027 के चुनावों में भारी पड़ सकता है. इस बैठक में तीन प्रमुख मुद्दों पर चर्चा हुई: यूजीसी बिल (सवर्णों की नाराजगी), शंकराचार्य विवाद, और मणिकर्णिका घाट का सौंदर्यीकरण (अहिल्याबाई होलकर की मूर्ति गिरने का मामला).
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