'सुघर के बेटे ने जाटव का पानी पीया', छुआछूत को पटकने वाले 'पहलवान' मुलायम के सियासी किस्से

मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)
मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)फाइल फोटो: इंडिया टुडे

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते. यह बात तो 22 नवंबर 2021 की ही है. लखनऊ में जलसा लगा था. धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव 82 साल के हो गए थे और फिजाओं में उनके सम्मान में एक गाना तैर रहा था कि 'तेरी अलग है सबसे यहां बात मुलायम, बदले हैं तूने देश के हालात मुलायम.' और एक आज का वक्त है, जब नेताजी हमारे बीच नहीं हैं. 10 अक्टूबर 2022 को मुलायम सिंह यादव चिरनिद्रा में विलीन हो गए. आज यानी 22 नवंबर 2022 को नेताजी की जयंती है. मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी में उपचुनाव भी हो रहा है, जहां बहू डिंपल यादव उनकी लीगेसी को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं. अखिलेश, शिवपाल समेत पूरा यादव कुनबा मैनपुरी में कैंपेन कर रहा है, लेकिन सैफई में जयंती की तैयारियां भी जोरों पर हैं. आज इस खास दिन यूपी तक आपके लिए मुलायम सिंह यादव के निजी और सियासी जीवन के कुछ ऐसे पहलुओं को लेकर आया है, जिन्होंने पूरे समाज और देश पर अपनी अलग छाप छोड़ी.

आइए आज हम आपको रुबरु कराते हैं सैफई से शुरू हुए मुलायम सिंह यादव के उस किस्से से जो सियासत की दुनिया से होते हुए साउथ ब्लॉक में रक्षा मंत्री तक पहुंचा और पीएम आवास तक पहुंचते-पहुंचते रह गया.

अहम बिंदु

मुलायम सिंह यादव संक्षिप्त जीवन परिचय: इटावा जिले के सैफई गांव में 22 नवंबर, 1939 को जन्‍मे मुलायम सिंह यादव ने शुरुआती जीवन एक शिक्षक के रूप में शुरू किया. 1967 में पहली बार विधानसभा के सदस्य चुने गए. वह साल 1977 में रामनरेश यादव के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश सरकार में पहली बार मंत्री बने. वर्ष 1989 में वह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 1996 में मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने के बाद संयुक्त मोर्चा की सरकार में वह रक्षा मंत्री भी बने. मुलायम सिंह यादव 2003 से 2007 तक दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. अपने लंबे राजनीतिक जीवन में मुलायम सिंह यादव ने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं. उन्होंने 1992 में समाजवादी पार्टी की स्थापना की.

सैफई से पहले फिरोजाबाद के इटौली से भी रहा है मुलायम सिंह यादव का एक कनेक्शन

मुलायम सिंह यादव या उनके कुनबे का जिक्र होते ही हाइटेक गांव सैफई और इसकी चमकती तस्वीर सामने आती है. कम ही लोग जानते हैं कि मुलायम सिंह यादव का फिरोजाबाद के इटौली से भी एक कनेक्शन रहा है. संजय लाठर की किताब 'समाजवाद का सारथी' में बताया गया है कि मुलायम के दादा खड़गजीत सिंह यादव फिरोजाबाद जिले के इटौली से आकर सैफई में बसे थे.

इटौली में खड़गजीत सिंह का काफी सम्मान था. वह गरीबों, कमजोरों की मदद के लिए जाने जाते थे. तब अंग्रेजों के शासन के खिलाफ भी लोगों को एकजुट किया करते थे. खड़गजीत सिंह के दो ही शौक थे- पहला कुश्ती लड़ना और दूसरा घुड़सवारी. शायद पहलवानी का शौक मुलायम सिंह को पुश्तैनी ही मिला था. किताब के मुताबिक एक अंग्रेज अफसर खड़गजीत सिंह का घोड़ा लेना चाहता था. इसी को लेकर विवाद हुआ और उन्होंने अफसर को पटक कर खूब पीटा. बाद में अंग्रेजों ने खड़गजीत सिंह के पिता को गिरफ्तार कर लिया और उनके घोड़े को गोली मार दी. अंग्रेजों से लड़ते और छिपते-छिपाते हुए यह परिवार सैफई पहुंचा और खड़गजीत सिंह ने अपने पिता के दोस्त के यहां शरण ली.

पिता के दोस्त ने अपनी एकलौती बेटी की शादी खड़गजीत सिंह के साथ कर दी. इस तरह दोनों परिवारों की दोस्ती रिश्तेदारी में बदल गई. खड़गजीत की पत्नी ने चार बेटों और एक बेटी को जन्म दिया. उन्होंने अपने बेटों के नाम छेदा लाल, बच्ची लाल, सुघर सिंह और बादशाह सिंह रखे. बता दें कि 22 नवंबर, 1939 को जन्मे मुलायम सिंह यादव खड़गजीत सिंह के तीसरे नंबर के बेटे सुघर सिंह के बेटे हैं.

सुघर यादव के लड़के ने जाटव के घर पानी पीया! 1962 के चुनावों का यह किस्सा मशहूर है

बात 1962 के चुनावों की है. मुलायम सिंह यादव काफी सक्रिय थे और चुनावी पर्चियां बांटने पड़ोस के गांव मुछहरा गए हुए थे. इस दौरान वह इंटर कॉलेज में साथ पढ़े साथी गंगादयाल जाटव के घर भी पहुंचे. साथी ने नेताजी और साथ के लोगों को गुड़ खिलाया, पानी पिलाया. इधर सैफई में हल्ला मच गया कि सुघर यादव के लड़के ने जाटव के घर पानी पी लिया.

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तब गांव के मुखिया नेताजी के दोस्त दर्शन सिंह के बड़े भाई थे. गांव के लोगों ने मुखिया पर नेताजी के बहिष्कार का दबाव बनाया. संजय लाठर की किताब 'समाजवाद का सारथी' के मुताबिक मुखिया ने फैसला सुनाया, मुलायम को छेक (बहिष्कृत कर) दो. दोस्त दर्शन सिंह ने स्कूल से लौटने पर मुलायम को इस फैसले की जानकारी दी. दोनों दोस्त इस फैसले के खिलाफ जुगत भिड़ाने लगे. उन्हें एक तरीका सूझा. दोनों गांव के ही एक किसान के खेत पहुंचे. वहां उससे आलू मांगा और भूनकर वहीं खाया और पानी पीया. फिर दोनों दोस्त गांव के बुजुर्ग और शुरुआती शिक्षक महेंद्र सिंह के घर पहुंचे. उन्हें सारी बात बताई. महेंद्र सिंह पढ़े-लिखे थे. उन्हें नेताजी की बात समझ में आ गई.

वह दोनों को लेकर मुखिया के पास पहुंचे. नेताजी के दोस्त दर्शन सिंह ने अपने मुखिया बड़े भाई से कहा कि उन्होंने गांव से छेक दिए गए मुलायम के साथ पानी पिया है और अब उन्हें भी छेका जाए. दर्शन सिंह जिद पर अड़े और महेंद्र सिंह ने मुखिया को समझाया. मुखिया को अपना फैसला वापस लेना पड़ा.

फिर शुरु हुआ सक्सेसफुल पोलिटिकल करियर

मुलायम सिंह यादव जैसा विशाल और सक्सेसफुल पोलिटिकल करियर कम ही नेताओं का हुआ. अपने जीवनकाल में मुलायम कुल 7 बार सांसद बने. मुलायम सिंह पहली बार 1996 में 11वीं लोकसभा के लिए सांसद बने. उसी साल मुलायम ने तत्कालीन पीएम एचडी देवगौड़ा की कैबिनेट में रक्षा मंत्री की भूमिका भी अदा की. मुलायम दूसरी बार सांसद12वीं लोकसभा के लिए 1998 में बने. इसी तरह 1999 में 13वीं लोकसभा, 2004 में 14वीं लोकसभा, 2009 में 15वीं लोकसभा, 2014 में 16वीं लोकसभा और 2019 में 17वीं लोकसभा के लिए सांसद बने. लगातार 8 बार विधायक और लगातार 7 बार सांसद बनने का यह अद्भुत रिकॉर्ड भी 'धरती पुत्र' के नाम से विख्यात मुलायम के हिस्से आया.
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मुलायम की चुनावी अखाड़े में एंट्री कराने में उनके राजनीतिक गुरु नत्थू सिंह का बड़ा हाथ माना जाता है. नत्थू सिंह ने 1967 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुलायम को जसवंतनगर सीट से उतारने पर जोर दिया था. उस दौरान नत्थू सिंह ने लोहिया से कहा था कि वे उनकी पार्टी को एक नौजवान और जुझारू नेता दे रहे हैं. नत्थू सिंह के जोर देने के बाद मुलायम को उस साल जसवंतनगर सीट से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया. मुलायम ने अपने राजनीतिक गुरु की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए इस चुनाव में जीत हासिल की और वह 28 साल की उम्र में राज्य के सबसे कम उम्र के विधायक बने.

विधायक से मुख्यमंत्री पद का सफर, मुलायम ने यूं किया तय

मुलायम जिस समाजवादी मुहिम से जुड़े थे, उसे तब एक बड़ा झटका लगा, जब 12 नवंबर 1967 को लोहिया का निधन हो गया. लोहिया के निधन के बाद संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी कमजोर पड़ने लगी. 1969 के विधानसभा चुनाव में मुलायम भी हार गए. इसी बीच, चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय लोकदल मजबूत होने लगी थी. ऐसे में मुलायम भी इसी पार्टी में शामिल हो गए.

इसके बाद समय के साथ मुलायम का सफर जनता दल तक पहुंच गया. साल 1989 में जब जनता दल उत्तर प्रदेश की सत्ता में आया तो मुलायम को मुख्यमंत्री बनाया गया. बीजेपी इस सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी, जिसने कुछ ही वक्त में अपना समर्थन वापस भी ले लिया. सियासी उठापटक के बीच, 1990 में केंद्र में वीपी सिंह की अगुवाई वाली जनता दल की सरकार गिर गई.

प्रधानमंत्री के तौर पर वीपी सिंह के इस्तीफे के बाद, केंद्र में कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर की अगुवाई वाली सरकार बनी, जो जनता दल से अलग हो गए. वहीं यूपी में, कांग्रेस ने चंद्रशेखर के गुट में शामिल मुलायम की अगुवाई वाली सरकार को बाहरी समर्थन से समर्थन दिया. हालांकि, 1991 में कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद ये दोनों सरकारें गिर गईं.

इस दौरान भले ही बतौर मुख्यमंत्री मुलायम का कार्यकाल छोटा रहा, लेकिन वह उत्तर प्रदेश की सियासत का बड़ा चेहरा बन चुके थे. बीजेपी जब राम मंदिर के लिए मुहिम पर जोर दे रही थी, उस दौरान मुलायम मुस्लिमों के प्रति नरम रुख नेता के तौर पर उभरे. आखिरकार मुलायम ने 1992 में खुद की पार्टी (एसपी) बना ली. बाद में मुलायम सिंह यादव ने 1992 में सपा का गठन किया. बीएसपी के साथ गठबंधन कर 1993 का चुनाव जीता. 1995 में बीएसपी ने समर्थन वापस ले लिया. गेस्ट हाउस कांड हुआ. 2003 में मुलायम ने फिर यूपी का चुनाव जीता और सीएम बने.

एक वक्त आया जब मुलायम सिंह यादव पीएम बनते-बनते रह गए

लोहिया की पाठशाला से निकले इस समाजवादी क्षत्रप ने भारतीय संसदीय लोकतंत्र में लगभग टॉप के सभी पदों को हासिल किया. सिर्फ एक पद मुलायम सिंह यादव के हाथ से रेत की तरह फिसल गया और शायद इस बात का मलाल नेताजी को भी अंत तक रहा होगा. यह था संसदीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पद, यानी प्रधानमंत्री का पद. यह बात तबकी है जब जनता दल की तरफ से केंद्र में वीपी सिंह पीएम थे और यूपी में मुलायम सीएम. इस किस्से को विस्तार से यहां पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है.

मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)
वाराणसी में इस शख्स के सपनों में आते हैं 'नेताजी' मुलायम सिंह यादव, देते हैं ये खास संदेश

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