यूपी में इन 3 कारणों की वजह से क्या टल जाएंगे पंचायत चुनाव? सामने आया बड़ा अपडेट
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टलने की खबरों के बीच पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बड़ा बयान दिया है. सोशल मीडिया पर चर्चा है कि शंकराचार्य विवाद और यूजीसी नियमों पर उपजी नाराजगी के कारण चुनाव टल सकते हैं. लेकिन इस बीच ओपी राजभर का ने बड़ा बयान दिया है.
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उत्तर प्रदेश के गांवों में इन दिनों एक ही चर्चा आम है कि आखिर पंचायत चुनाव कब होंगे? बीते कुछ दिनों से राज्य के राजनीतिक हालात और प्रशासनिक व्यस्तता को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि पंचायत चुनाव आगे बढ़ सकते हैं. शंकराचार्य विवाद, यूजीसी के नए नियमों पर उपजी नाराजगी और प्रशासनिक व्यस्तता ने इन अफवाहों को हवा दी है. लेकिन यूपी के पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर का दावा है कि चुनाव अपने तय समय पर ही होंगे और तैयारियां पूरी की जा रही हैं.
सोशल मीडिया पर चुनाव टलने की खबरों के पीछे तीन मुख्य कारण बताए जा रहे हैं. पहला ये कि प्रयागराज में शंकराचार्य और प्रशासन के बीच हुए विवाद के बाद कई अधिकारियों की नाराजगी और इस्तीफे की खबरों ने सरकार की मशीनरी पर दबाव बनाया है. दूसरा यूजीसी (UGC) के नए नियमों को लेकर 'अपर कास्ट' वोटरों में दिख रही नाराजगी से सरकार बैकफुट पर नजर आ रही है. चर्चा है कि इस माहौल में सरकार चुनाव का जोखिम नहीं लेना चाहती. वहीं तीसरी ये कि फरवरी का महीना शुरू होने वाला है. लेकिन अभी तक सरकार के भीतर उस स्तर की सक्रियता नहीं दिख रही है जैसी पंचायत चुनाव से पहले होती है.
मंत्री ओम प्रकाश राजभर का दोटूक जवाब
इन तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा है कि उन्होंने खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस विषय पर चर्चा की है. राजभर के मुताबिक फिलहाल अधिकारी और कर्मचारी SIR जैसे कुछ जरूरी कामों में बिजी चल रहे हैं. जैसे ही वे खाली होंगे वैसे ही चुनाव प्रक्रिया में तेजी आएगी. चुनाव समय पर ही संपन्न कराए जाएंगे. ओपी राजभर ने मीडिया द्वारा बनाए जा रहे माहौल को खारिज करते हुए साफ किया कि अप्रैल से जुलाई के बीच चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद है.
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आरक्षण की सूची पर टिकी सबकी निगाहें
पंचायत चुनाव में सबसे बड़ा पेंच आरक्षण सूची को लेकर फंसता है. अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि कौन सी सीट एससी-एसटी (SC-ST) के लिए आरक्षित होगी,कहां ओबीसी उम्मीदवार होंगे और कौन सी सीट सामान्य रहेगी. इसी सूची के आधार पर तय होगा कि पुराने धुरंधर मैदान में उतर पाएंगे या नहीं. लोग अपनी-अपनी सीटों को मैनेज करने की जुगत में भी लगे हैं. भले ही सरकार अभी शांत दिख रही हो. लेकिन भाजपा,सपा, कांग्रेस और बसपा जैसे दल जमीनी स्तर पर सक्रिय हैं. प्रत्याशी टिकट के लिए पार्टियों के चक्कर काट रहे हैं और गांवों में बैठकों का दौर शुरू हो चुका है. मौजूदा प्रधानों और नए दावेदारों के बीच खर्चे और हिसाब-किताब की होड़ मची है.










