Etawah Ka Mood Kya Hai: अखिलेश यादव के 'गढ़' इटावा में सपा का क्या होगा? ग्राउंड पर मौजूद पत्रकारों ने बता दी किसकी है मजबूत स्थिती
यूपी Tak की खास रिपोर्ट में जानिए 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इटावा का राजनीतिक मूड. जसवंतनगर, इटावा सदर और भरथना सीटों के जातीय समीकरण, संभावित उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और वरिष्ठ पत्रकारों के ग्राउंड विश्लेषण से समझें चुनावी तस्वीर.
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Mood Kya Hai: उत्तर प्रदेश के सबसे हाई-प्रोफाइल जिलों में शुमार और सपा के गढ़ इटावा में विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से सियासी गोटियां बिछनी शुरू हो गई हैं. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में इटावा जिले की तीन सीटों में से दो जसवंतनगर और भरथना पर समाजवादी पार्टी ने परचम लहराया था. जबकि इटावा सदर की सीट बेहद मामूली अंतर से बीजेपी के खाते में गई थी. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने इस पूरे समीकरण को पलटकर रख दिया. तो आखिर 2027 में इटावा का 'मूड क्या है'? यूपी Tak की खास सीरीज में जिले के उन वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषणात्मक दिग्गजों से सीधी बातचीत की गई जो पिछले 40 सालों से यहां की जमीनी राजनीति को कवर कर रहे हैं. उनके विश्लेषण ने तीनों सीटों के जातिगत समीकरणों, उम्मीदवारों की साख और जनता के असल मुद्दों को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है.
शिवपाल यादव का वो अभेद्य किला जिसे ढहाना नामुमकिन
इटावा की जसवंतनगर सीट को लेकर जिले के सभी वरिष्ठ पत्रकारों का एक सुर में मानना है कि यहां 2027 में भी कोई उलटफेर नहीं होने वाला. लगातार सात बार से विधायक और सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव का इस सीट पर निर्विवाद दबदबा कायम है.
यहां यादव और शाक्य मतदाताओं का अटूट गठजोड़ है जो पूरी तरह सपा के साथ खड़ा रहता है. वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक, शिवपाल यादव ने जाति से ऊपर उठकर हर वर्ग के लोगों के व्यक्तिगत काम किए हैं. यही वजह है कि यहां भाजपा की कोशिशें ना के बराबर साबित होती हैं और खुद बीजेपी भी मानती है कि इस सीट को हिला पाना लगभग नामुमकिन है.
क्या बीजेपी की सरिता को रोक पाएगा सपा का शाक्य-लोधी दांव?
साल 2022 में इटावा सदर सीट पर बीजेपी की सरिता भदौरिया ने बेहद करीबी मुकाबले में जीत दर्ज की थी. लेकिन 2027 की डगर उनके लिए इतनी आसान नहीं रहने वाली.
बीजेपी की ताकत और कमजोरी: यह सीट सवर्ण बाहुल्य (ब्राह्मण, वैश्य, जैन) है, जिसके साथ लोधी और कुछ अन्य पिछड़ा वर्ग का वोट मिलकर बीजेपी को मजबूत बनाता है. हालांकि स्थानीय विश्लेषकों का मानना है कि इस बार सरकार की नीतियों और स्थानीय मुद्दों को लेकर ब्राह्मण वोटर्स के एक धड़े में नाराजगी देखने को मिल रही है.
सपा का मास्टरस्ट्रोक: पत्रकारों के अनुसार, यदि समाजवादी पार्टी इस बार किसी लोधी या शाक्य चेहरे पर दांव लगाती है तो बीजेपी का यह मजबूत किला ढह सकता है. लोधी वोटर पारंपरिक रूप से बीजेपी का माना जाता है. लेकिन अपनी बिरादरी का मजबूत प्रत्याशी सामने होने पर वह टूट सकता है. पिछली बार सपा के शाक्य उम्मीदवार ने बीजेपी को नाक चने चबवा दिए थे.
भरथना (सुरक्षित सीट): सपा-भाजपा में कांटे की टक्कर, क्या पलटेगा पासा?
भरथना सुरक्षित सीट पर फिलहाल सपा के राघवेंद्र गौतम विधायक हैं. दलित बाहुल्य इस सीट पर इस बार कड़े त्रिकोणीय या सीधे मुकाबले के आसार बन रहे हैं.
बीजेपी के दावेदार: बीजेपी की तरफ से पूर्व लोकप्रिय नेता गौरी शंकर के परिवार से सिद्धार्थ शंकर, समीर दोहरे और पूर्व विधायक सावित्री कठेरिया टिकट की दौड़ में हैं. विश्लेषकों का कहना है कि सिद्धार्थ शंकर की पारिवारिक पृष्ठभूमि मजबूत है. लेकिन केवल चुनाव के वक्त क्षेत्र में सक्रिय होने की उनकी आदत से जनता नाराज हो सकती है.
एंटी-इन्कंबेंसी का खतरा: पत्रकारों का कहना है कि जितनी सत्ता पक्ष के खिलाफ नाराजगी होती है उतनी ही कई बार काम न करा पाने के कारण विपक्ष के मौजूदा विधायक के खिलाफ भी होती है. अगर बीजेपी यहां सही उम्मीदवार चुनती है तो भरथना में पासा पूरी तरह पलट सकता है.
2027 के महामुकाबले में हावी रहेंगे ये बड़े मुद्दे
इटावा के वरिष्ठ पत्रकारों की मानें तो इस बार केवल जातीय समीकरण ही नहीं बल्कि कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक मुद्दे भी मतदान के दिन निर्णायक भूमिका निभाएंगे.
भ्रष्टाचार और युवाओं का भविष्य: पेपर लीक और हाल ही में यूजीसी-नीट (UG-NET) परीक्षाओं को लेकर हुए विवादों से युवाओं और उनके अभिभावकों में भारी आक्रोश है. लोग अपने बच्चों के 5 साल के भविष्य को लेकर काफी संवेदनशील हैं.
सुरक्षा बनाम स्थानीय समस्याएं: एक ओर कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के मुद्दे पर बीजेपी को बढ़त मिलती दिख रही है. वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर जलभराव, गंदगी और जर्जर सड़कों जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर लोगों में भारी नाराजगी है.
सपा का पीडीए कार्ड
अगर समाजवादी पार्टी ने 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' (PDA) के फार्मूले के तहत टिकटों का सही बंटवारा किया तो उनकी राह बेहद आसान हो जाएगी.
टिकट वितरण ही तय करेगा इटावा का भविष्य
वरिष्ठ पत्रकारों के इस गहन विश्लेषण से साफ है कि 2027 के रण में इटावा जिला बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है. जसवंतनगर जहां सपा के पाले में सुरक्षित दिख रही है. वहीं इटावा सदर और भरथना सीट पर जीत-हार पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि बीजेपी और सपा अपने टिकट वितरण में किस हद तक सामाजिक और जातीय संतुलन साध पाते हैं. फिलहाल दोनों ही दलों के पास दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है और असली मुकाबला टिकटों की घोषणा के बाद ही शुरू होगा.
