गुर्जर Vs राजपूत के चक्कर में फंसी सरकार, जानिए कौन थे मिहिर भोज और क्या है पूरा विवाद

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आपको उत्तर प्रदेश की सियासत से जुड़े दो हालिया बयान दिखाते हैं. एक समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और दूसरा बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती का.

”ये इतिहास में पढ़ाया जाता रहा है कि सम्राट मिहिर भोज गुर्जर-प्रतिहार थे पर भाजपाइयों ने उनकी जाति ही बदल दी है. निंदनीय! छलवश भाजपा स्थापित ऐतिहासिक तथ्यों से जान-बूझकर छेड़छाड़ व सामाजिक विघटन करके किसी एक पक्ष को अपनी तरफ करती रही है. हम हर समाज के मान-सम्मान के साथ हैं!”

अखिलेश यादव

”अभी हाल ही में दिनांक 22 सितंबर 2021 को गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की दादरी में यूपी सरकार द्वारा लगाई गई प्रतिमा का मा. मुख्यमंत्री ने गुर्जर शब्द के हटी हुई स्थिति में जो उसका अनावरण किया है उससे गुर्जर समाज की भावनाओं को जबरदस्त ठेस पहुंची है तथा वे काफी दुखी व आहत हैं. इतना ही नहीं बल्कि गुर्जर समाज के इतिहास के साथ ऐसी छेड़छाड़ करना अति-निन्दनीय तथा सरकार इसके लिए माफी मांगे व साथ ही प्रतिमा में इस शब्द को तुरन्त जुड़वाए, बीएसपी की यह मांग.”

मायावती

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इन दो बयानों से यूपी की राजनीति में चल रहे एक विवाद की एक झलक आपको मिल गई होगी. असल में उत्तर प्रदेश में इतिहास के एक किरदार को लेकर बवाल चल रहा है. वो किरदार हैं सम्राट मिहिर भोज. इस विवाद की शुरुआत हुई सीएम योगी आदित्यनाथ द्वारा 22 सितंबर 2021 को ग्रेटर नोएडा के दादरी स्थित सम्राट मिहिर भोज कॉलेज के परिसर में लगी सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण से. इस अनावरण से पहले प्रतिमा पर सम्राट मिहिर भोज के नाम के आगे लिखा गुर्जर शब्द मिटा दिया गया. अब इसे लेकर गुर्जर समाज आंदोलनरत है. सीएम के दौरे से पहले प्रतिमा पर गुर्जर सम्राट मिहिर भोज लिखा गया था, जिसको लेकर तब राजपूत समाज ने आपत्ति जताई थी. राजपूतों के विरोध के बाद गुर्जर हटाया गया, तो अब गुर्जर समाज भड़क गया. हालात ये हैं कि इस मामले को लेकर अब राष्ट्रीय गुर्जर स्वाभिमान समिति गठित हो गई है. 151 सदस्य नियुक्त कर दिए गए हैं और आंदोलन को आगे बढ़ाने में ताकत झोंक दी गई है.

अब सवाल यह है कि आखिर इस पूरे विवाद की असल कहानी क्या है? कौन हैं सम्राट मिहिर भोज? ये गुर्जर बनाम राजपूत विवाद क्या है? यूपी तक ने इस मामले को तह तक समझने के लिए इतिहास की किताबों और इतिहासकारों का रुख किया. आइए विस्तार से समझते हैं इस पूरे विवाद को.

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कौन थे सम्राट मिहिर भोज?

सम्राट मिहिर भोज के बारे में जानकारी के लिए हमने एनसीईआरटी की किताब का रुख किया. ओल्ड एनसीईआरटी में 11वीं की मध्यकालीन इतिहास (सतीश चंद्रा) की किताब में प्रतिहार साम्राज्य और मिहिर भोज के बारे में जानकारी दी गई है. इसके पेज नंबर 13 पर बताया गया है कि प्रतिहारों को गुर्जर-प्रतिहार भी कहा जाता है, जिसका कारण शायद यह है कि उनका उद्भव गुर्जराष्ट्र या दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में हुआ था.

इसी में आगे बताया गया है कि प्रतिहार साम्राज्य के वास्तविक संस्थापक और इस राजवंश के महानतम शासक भोज थे. किताब के मुताबिक उनके आरंभिक जीवन के विषय में अधिक जानकारी नहीं है और यह भी मालूम नहीं है कि वह कब सिंहासन पर बैठे पर यह निश्चित है कि उन्होंने प्रतिहार साम्राज्य का पुनर्निर्माण किया.

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किताब में बताया गया है कि भोज विष्णु के भक्त थे और उन्होंने ‘आदिवराह’ की उपाधि धारण की थी. उनके कुछ सिक्कों पर ‘आदिवराह’ शब्द अंकित है. इसमें लिखा है, ‘उज्जैन के भोज परमार से इनका अंतर बताने के लिए इन्हें मिहिर भोज भी कहा जाता है. वस्तुत: भोज परमार ने मिहिर भोज के कुछ काल बाद शासन किया था.’

मिहिर भोज से जुड़ा गुर्जर-राजपूत विवाद क्या है?

राजा मिहिर भोज पर गुर्जर और राजपूत, दोनों का अपना-अपना दावा है. एक तबका उन्हें गुर्जर बता रहा है, तो दूसरा राजपूत. यूपी तक ने इस संबंध में इतिहासकारों से बात की. हमने युवा इतिहासकार और जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा में इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रितेश्वर नाथ तिवारी से बात की. उन्होंने मशहूर इतिहासकार केएम मुंशी समेत तमाम हवालों से गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासकों को लेकर अहम जानकारी दी.

उन्होंने बताया,

”गुर्जर मूलतः संस्कृत के शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है शत्रु विनाशक. इसी तरह प्रतिहार का अर्थ होता है द्वारपाल. मशहूर इतिहासकार केएम मुंशी अपने शोध में इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि गुर्जर शब्द जातिवाचक नहीं बल्कि स्थानवाचक है. प्रतिहार वंश का पहला अभिलेखीय साक्ष्य पुलकेशिन द्वितीय का एहोल अभिलेख है. इसके अलावा बाणभट्ट के चरित्रों, चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण, मुस्लिम यात्री सुलेमान की किताब, कल्हण की राजतरंगिणी और कवि राजशेखर की कविताओं में गुर्जर-प्रतिहार का जिक्र है.”

डॉ. रितेश्वर नाथ तिवारी

डॉ. तिवारी बताते हैं कि गुर्जर-प्रतिहार वंश के संदर्भ में ग्वालियर अभिलेख सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. उन्होंने हमें बताया कि चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने विवरण में गुर्जर देश का उल्लेख करते हुए गुर्जर नरेश को क्षत्रिय बताया है. उनके मुताबिक प्रतिहार वंश के जितने अभिलेख हैं उनमें वे खुद को श्रीराम के भ्राता लक्ष्मण के वंशज बताते हैं. जैसे लक्ष्मण अपने बड़े भाई के लिए द्वारपाल (प्रतिहार) की भूमिका में थे, वहीं की प्रेरणा से यह वंश अपने साथ प्रतिहार लगाता है. उन्होंने बताया कि इसके भी प्रमाण हैं कि प्रतिहार वंश के वैवाहिक संबंध राजपूत परिवारों में थे. मिहिर भोज की मां अप्पा देवी राजपूत परिवार से आती थीं. उनकी पत्नी चंद्रभट्टारिका देवी भी राजपूत खानदान से थीं.

डॉ. तिवारी आगे बताते हैं कि प्रतिहार वंश के शासक खुद को सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते थे. पृथ्वीराज रासो के अग्निकुंड के सिद्धांत के मुताबिक भी राजपूतों के चार वंश परमार, प्रतिहार, चौहान और चालुक्य का जिक्र है. हालांकि इसकी प्रामाणिकता को लेकर अभी विवाद है.

वह बताते हैं कि राजशेखर की कविताओं में गुर्जरों को रघुकुल तिलक कहा गया है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक पीएचडी History of the Gurjar Pratihar में भी इन्हें क्षत्रिय बताया गया है. नागोड़ और अलीपुरा रियासत खुद को प्रतिहारों का वंशज बताती हैं और खुद को क्षत्रिय लिखती हैं. डॉक्टर रितेश्वर नाथ तिवारी की नजर में यह विवाद निरर्थक है. वह कहते हैं, ”इतिहास के साथ न्याय तब होगा जब मिहिर भोज को गुर्जर-प्रतिहार वंशीय शासक कहा जाए.”

मेरठ कॉलेज के इतिहास प्रोफेसर डॉ. चंद्रशेखर भारद्वाज की राय क्या है?

मेरठ कॉलेज के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर चंद्रशेखर भारद्वाज का कहना है कि राजपूतों के 36 राजवंश उत्तर से दक्षिण भारत तक हुए हैं ,उसमें गुर्जर प्रतिहार वंश सर्वाधिक महत्वपूर्ण वंश हुआ है, जिसने राजपूत पीरियड में अपनी ऐतिहासिक भूमिका राजनीतिक रूप से निभाई है.

वह बताते हैं कि मिहिर भोज गुर्जर प्रतिहार के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे प्रतापी राजा हुए हैं. इनके बारे में विशेष जानकारी ग्वालियर के एक अभिलेख में मिलती है. दूसरी जानकारी कल्हण की राजतरंगिणी में है. हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात, उत्तरी और दक्षिण भारत के इलाके में राजपूतों के 36 राज्य स्थापित हुए. इनमें से गुर्जर प्रतिहार भी एक है. अर्थात जो मिहिर भोज हैं वह राजपूत इस दृष्टिकोण से हैं कि राजपूतों के 36 राजवंशों में से आते हैं और गुर्जर इसलिए हैं क्योंकि राजपूतों के 36 राजवंशी कुल में सर्वाधिक प्रतापी में से एक गुर्जरों के राजा हैं.

एएमयू के इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सैय्यद अली नदीम रेजावी की राय अलग

एएमयू के इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सैय्यद अली नदीम रेजावी की राय मिहिर भोज को लेकर अलग है. वह बताते हैं, ”गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के राजा थे. 10वीं शताब्दी के आसपास भारत छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित था. देश के पश्चिमी हिस्से में मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान के इलाके में प्रतिहारों का शासन था. अभिलेखों में इन्हें गुर्जर प्रतिहार कहा जाता है. आजकल के गुर्जर खुद को वहीं से जोड़ते हैं. राजपूत बनाम गुर्जर के विवाद पर कहते हैं कि उस जमाने में राजपूत थे ही नहीं. गुर्जर-प्रतिहार बिल्कुल अलग कम्युनिटी थी गुर्जरों की कम्युनिटी. इनका राजपूतों से कोई ताल्लुक नहीं था.”

यानी राजा मिहिर भोज और गुर्जर-प्रतिहार वंश को लेकर इतिहासकारों की राय भी बंटी नजर आ रही है. हालांकि यूपी में अब यह मामला राजनीतिक रूप से काफी तूल पकड़ता नजर आ रहा है. विपक्षी दल जहां इसे गुर्जर प्राइड से जोड़ रहे हैं, तो सरकार गुर्जर बनाम राजपूत विवाद में फंसती नजर आ रही है. यह विवाद आगामी विधानसभा चुनावों तक खिंचा, तो बीजेपी को इसका खामियाजा यूपी की गुर्जर बाहुल्य सीटों पर भी उठाना पड़ सकता है.

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