लेटेस्ट न्यूज़

UGC के नए नियमों पर बवाल के बीच सामान्य वर्ग या SC-ST-OBC, किसके साथ खड़े हैं अखिलेश यादव? 

कुमार अभिषेक

UP News: यूजीसी रेगुलेशंस 2026 पर यूपी में सियासी बवाल. अखिलेश यादव की 'सुरक्षित' चुप्पी और सपा का यू-टर्न क्या दर्शाता है? जानिए सवर्णों के विरोध और ओबीसी समर्थन के बीच फंसी पार्टियों का पूरा समीकरण.

ADVERTISEMENT

Akhilesh Yadav
Akhilesh Yadav
social share
google news

UP Political News: यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन के नए रेगुलेशंस को लेकर उत्तर प्रदेश में सियासी घमासान मचा हुआ है. इसके खिलाफ सामान्य वर्ग के उग्र विरोध और ओबीसी संगठनों के समर्थन के बीच समाजवादी पार्टी, बीजेपी और बसपा जैसी प्रमुख पार्टियों ने एक रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है. 

अखिलेश यादव का नपा-तुला रुख देखने को मिला

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने यूजीसी बिल पर सीधे विरोध या समर्थन के बजाय एक सुरक्षित रुख अपनाया है. उन्होंने केवल इतना कहा, "दोषी बचे नहीं और निर्दोष फंसे नहीं." यह बयान स्पष्ट करता है कि सपा सामान्य वर्ग के गुस्से को हवा देकर बीजेपी को नुकसान तो पहुंचाना चाहती है, लेकिन ओबीसी-दलित वोट बैंक के छिटकने के डर से बिल का खुलकर विरोध भी नहीं कर रही है. 

यहां नीचे हमारी खास पेशकश आज का यूपी में समझिए यूजीसी नियमों के इर्द गिर्द हो रही इस सियासत को

यह भी पढ़ें...

सपा प्रवक्ता का यू-टर्न

पार्टी के भीतर इस मुद्दे को लेकर कितनी दुविधा है, इसका अंदाजा प्रवक्ता फकरुल हसन चांद के बयान से लगाया जा सकता है. पहले उन्होंने यूजीसी बिल का समर्थन किया, लेकिन बाद में पार्टी के दबाव में उन्हें स्पष्टीकरण देना पड़ा कि उनका कोई निजी स्टैंड नहीं है और वे वही कहेंगे जो पार्टी का आधिकारिक पक्ष होगा. 

UGC विवाद से किसे फायदा, किसे नुकसान?

सवर्ण बीजेपी का कोर वोट बैंक हैं. यदि यह गुस्सा लंबे समय तक चला, तो बीजेपी को 2027 के चुनावों में भारी नुकसान हो सकता है. हालांकि, ओबीसी वर्ग में इस बिल को लेकर सहानुभूति भी दिख रही है. चंद्रशेखर आजाद और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेता खुलकर बिल के समर्थन में आ गए हैं, जिससे सपा और बसपा जैसी पार्टियों के लिए सवर्णों के साथ खड़ा होना और भी मुश्किल हो गया है. 

जानिए यूजीसी क्या है और इसके नए नियमों से जुड़े विवाद को भी समझिए 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है. इसकी स्थापना 1956 के UGC अधिनियम के तहत हुई. यह उच्च शिक्षा संस्थानों जैसे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के मानकों को निर्धारित करने, समन्वय करने और बनाए रखने का काम करता है. इसके प्रमुख काम में विश्वविद्यालयों को अनुदान वितरण, शिक्षण-शोध के गुणवत्ता मानदंड तय करना, डिग्री मान्यता देना, न्यूनतम शिक्षा मानकों पर नियम बनाना और केंद्र-राज्य सरकारों को उच्च शिक्षा सुधारों पर सलाह देना शामिल है. 

फिलहाल UGC के 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026' (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) पर देशभर बवाल मचा है. ये रेगुलेशंस 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित हुए. ये नियम SC/ST/OBC छात्रों-शिक्षकों को जातिगत भेदभाव की शिकायत दर्ज करने का अधिकार देते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये सामान्य वर्ग को पूर्व-निर्धारित 'शोषक' मानकर असमानता पैदा करते हैं. शोषित की परिभाषा सिर्फ आरक्षित वर्गों तक सीमित रखी गई है. कुछ एक्सपर्ट्स ने इन्हें रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन, कमिटी में सवर्ण प्रतिनिधित्व की कमी, गलत शिकायतों पर दंड न होना और समाज को जाति-आधारित विभाजन करने वाला बताया है. सोशल मीडिया पर विरोध तेज है, इसे संविधान के समानता सिद्धांत (अनुच्छेद 14-16) का उल्लंघन बताते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गया है.

ये भी पढ़ें: UGC के नए नियमों पर भारी बवाल के बीच अखिलेश यादव का आया पहला रिएक्शन, ये 2 बातें कहकर अपना स्टैंड बता दिया