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कौन हैं असली शंकराचार्य? जानिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा पूरा विवाद

Who is the real Shankaracharya: प्रयागराज माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच तनाव चरम पर है. मौनी अमावस्या पर स्नान को लेकर हुए विवाद के बाद अब मेला प्रशासन ने नोटिस जारी कर अविमुक्तेश्वरानंद से उनके शंकराचार्य पद की वैधता पर सवाल पूछा है. प्रशासन का तर्क है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है जबकि स्वामी जी का कहना है कि उनके पद का निर्णय राजनीतिक शक्तियां नहीं बल्कि धर्मपीठें करती हैं.

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Swami Avimukteshwarananda Saraswati
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Who is the real Shankaracharya: ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर बवाल चल रहा है. प्रयागराज माघ मेला मौनी अमावस्या का स्नान करने से कथित तौर पर रोकने के बाद अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर हैं. वह प्रशासन पर शंकराचार्य के पद और हिंदू धार्मिक आस्था के अपमान का आरोप लगा रहे हैं. प्रयागराज मेला प्रशासन इन आरोपों से इनकार कर रहा है. इसी दौरान प्रयागराज मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस सौंपकर पूछा है कि जब उनके पद से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो वो किस आधार पर खुद को शंकराचार्य कह रहे हैं. इसपर भी अविमुक्तेश्वरानंद भड़के हुए हैं. 

ऐसे में मौजूदा विवाद और 'असली बनाम नकली' शंकराचार्य की बहस पर UP Tak की विशेष रिपोर्ट को यहां नीचे देखा जा सकता है. 

शंकराचार्य से जुड़े विवाद की ताजा वजह

प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और पुलिस के बीच तीखी झड़प हुई. इसके बाद प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने उनके शिविर पर एक नोटिस चस्पा किया. इसमें 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया है कि वे अपने नाम के आगे 'शंकराचार्य' शब्द का प्रयोग कैसे कर रहे हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके पट्टाभिषेक को लेकर कुछ आदेश दिए हैं.

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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि प्रशासन, मुख्यमंत्री या राष्ट्रपति यह तय नहीं कर सकते कि कौन शंकराचार्य है. उनके अनुसार शंकराचार्य का निर्णय शंकराचार्य करते हैं. उन्हें चार में से दो पीठों (शृंगेरी और द्वारका) का लिखित समर्थन प्राप्त है और तीसरे (पुरी) की मौन स्वीकृति है. शृंगेरी और द्वारका के शंकराचार्यों ने उन्हें मान्यता दी है और वे उनके साथ स्नान भी कर चुके हैं.  

कानूनी विवाद और सुप्रीम कोर्ट का आदेश

अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी जिसमें उनके पट्टाभिषेक पर रोक लगाने की मांग की गई थी. कोर्ट ने आदेश दिया था कि फिलहाल कोई नया पट्टाभिषेक न किया जाए. अविमुक्तेश्वरानंद के वकील पीएन मिश्रा का तर्क है कि कोर्ट के आदेश से पहले ही (सितंबर 2022 में) उनका पट्टाभिषेक शृंगेरी और द्वारका पीठों में विधिवत रूप से संपन्न हो चुका था, इसलिए वे घोषित रूप से शंकराचार्य हैं.  यह विवाद 1992 से चला आ रहा है. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु) के निधन के बाद उत्तराधिकार को लेकर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती और अविमुक्तेश्वरानंद के बीच कानूनी जंग जारी है. 

शंकराचार्य परंपरा और पीठ

आदि शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना की थी. वर्तमान में मान्यता प्राप्त मुख्य नाम इस प्रकार हैं:

शारदा पीठ (द्वारका): स्वामी सदानंद सरस्वती.
ज्योतिष मठ (बद्रिकाश्रम): स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (विवादित/विचाराधीन).
गोवर्धन पीठ (पुरी): स्वामी निश्चलानंद सरस्वती. 
शृंगेरी पीठ (दक्षिण): स्वामी भारती तीर्थ जी.

फिलहाल, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मौखिक और पीठों की परंपरा के अनुसार खुद को शंकराचार्य मानते हैं, जबकि कानूनी रूप से यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.