Chandauli: स्कूल तक नहीं जाता है कोई भी रास्ता! गुम नहीं हुई सड़क, सरकार बनवा ही नहीं पाई

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चंदौली के इस स्कूल के लिए रास्ता ही नहीं.
चंदौली के इस स्कूल के लिए रास्ता ही नहीं.तस्वीर: उदय गुप्ता, यूपी तक.

UP News in Hindi : उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा पर जबरदस्त जोर दिया जाता है और सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के लिए तमाम तरह की क़वायदें भी होती हैं. ऐसा इसलिए ताकि सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई के प्रति आकर्षित किया जा सके. सरकार का जोर है कि अधिक से अधिक बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई करें. सरकार की तरफ से मिड डे मील और ड्रेस और मुफ्त किताबें भी दी जा रही हैं, लेकिन आज हम आपको उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh news) के एक ऐसे स्कूल से रूबरू कराने जा रहे हैं, जिसे तकरीबन 25 साल पहले सरकार ने बनवा तो दिया, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए रास्ता बनाना शायद भूल गई.

अहम बिंदु

आज आलम यह है बरसात की वजह से यह स्कूल टापू बन गया है और चारों तरफ खेतों में पानी भरा हुआ है और नौनिहाल स्कूल जाने के लिए खेत की मेड़ों से होकर गिरते-पड़ते स्कूल पहुंचते हैं. छुट्टी होने पर ऐसे ही स्कूल से घर को जाते हैं. विभागीय अधिकारियों का कहना है कि स्कूल के सटे हुए जिनके खेत हैं, वे लोग रास्ते के लिए जमीन नहीं दे रहे हैं.

स्कूल बने 25 साल से ऊपर हुए, रास्ते की सुध किसी को नहीं

यह तस्वीर पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले (Chandauli News) के सदर विकास खंड के मसौनी गांव के प्राथमिक स्कूल की है. आप साफ-साफ देख सकते हैं कि स्कूल तो बना दिया गया है, लेकिन वहां पहुंचने के लिए कोई रास्ता ही नहीं है. छोटे-छोटे मासूम बच्चे खेतों के बीच से और खेतों की मेड़ से होकर स्कूल से वापस अपने घरों को लौट रहे हैं. दरअसल मसौनी गांव में इस प्राथमिक स्कूल का निर्माण साल 1995 के आस-पास किया गया था. स्कूल की बिल्डिंग काफी अच्छी तरीके से बनाई गई. गांव में जब स्कूल बना तो बच्चों ने एडमिशन भी लेना शुरू कर दिया.

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UP Latest News : तकरीबन पौने दो सौ बच्चे इस स्कूल में पढ़ते हैं, लेकिन स्कूल तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता नहीं होने की वजह से उनको काफी परेशानी उठानी पड़ती है. खासकर बरसात के दिनों में तो हालत और भी खराब हो जाती है. यही नहीं बरसात के दिनों में स्कूल आने में बच्चे और अध्यापक गिरकर घायल भी हो जाते हैं.

इस संबंध में प्राथमिक विद्यालय मसौनी की शिक्षा मित्र तारा कुमारी बताती हैं, ''2005 में मेरी नियुक्ति हुई है. हम लोग गिरते पड़ते स्कूल आते हैं. कभी इधर से आते हैं कभी उधर से आते हैं. हम लोगों को आने-जाने के लिए रास्ता नहीं है. रास्ते पर कांटा रख दिया जाता है. हम कई बार चोटिल हो चुके हैं. जिनका खेत है वह कहते हैं कि हमारे नंबर एक का खेत है. हम खेत में रास्ता नहीं देंगे. हम लोग कहते हैं कि हम लोगों को बस मेंड़ दे दीजीए, लेकिन वह भी काट दी जाती है. इसी तरह एक छात्र त्रयंबक ने भी बताया कि आने जाने में बहुत दिक्कत होता है. हमारी मैम भी गिर गई. हमारे हाथ में चोट आया है. हर तरफ कीचड़ हो गया है.

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स्थानीय निवासी धर्मेंद्र मिश्रा का कहना है कि, 'सरकार जब स्कूल बना रही थी, तो उस समय भी सोचना चाहिए था कि रोड है या नहीं है. जब सड़क नहीं है तो स्कूल नहीं बनाना चाहिए. पिछले साल हमारा बच्चा गिर गया था. उसे हाथ में चोट लग गया. उसके बाद हमने अपने बच्चे का दाखिला दूसरे स्कूल में करा दिया. हम लोग यहां अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं, चोट लगने के लिए नहीं.'

जानिए शिक्षा विभाग क्या तर्क दे रहा है

यूपी (UP) तक की टीम जब मसौनी गांव के इस प्राथमिक स्कूल के पास पहुंची तो हैरान रह गई. हमने देखा कि स्कूल तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता ही नहीं है. हम भी खेतों के रास्ते से ही होकर स्कूल तक पहुंचे और वहां पढ़ने आए बच्चों और अध्यापकों से बातचीत की. गांव के बाहर हमें एक ग्रामीण भी मिले, जिन्होंने बताया कि उन्होंने भी अपने बच्चे का एडमिशन स्कूल में कराया था, लेकिन रास्ता नहीं होने की वजह से उनका बच्चा गिर कर घायल हो गया था. इसके बाद उन्होंने अपने घर के बच्चों का एडमिशन किसी और स्कूल में करा लिया. इसके बाद हम शिक्षा विभाग के दफ्तर पहुंचे और वहां पर मौजूद क्षेत्रीय खंड शिक्षा अधिकारी सुरेंद्र बहादुर सिंह से मुलाकात की और हमने उनसे जानने की कोशिश की कि आखिर स्कूल बनने के बाद रास्ता क्यों नहीं बन पाया.

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खंड शिक्षा अधिकारी ने बताया कि विद्यालय के आसपास चारों तरफ गांव वालों के खेत हैं और गांव वाले रास्ता बनाने के लिए जमीन नहीं दे रहे हैं. गांव वालों से काफी बातचीत की गई और प्रयास भी किया गया कि वह कुछ जमीन दे दें ताकि बच्चों को आने-जाने के लिए रास्ता बनाया जा सके, लेकिन वे लोग राजी नहीं हुए.

सुरेंद्र बहादुर सिंह ने कहा, 'विद्यालय काफी पहले का बना हुआ है और एप्रोच मार्ग वहां पर नहीं है, क्योंकि जो संक्रमणीय भूमिधर है उनकी जमीन आसपास पड़ती है उनसे वार्ता कई बार हम ने भी किया और प्रधान जी के माध्यम से भी किया पर अपनी जमीन कोई रास्ता के लिए देने के लिए तैयार नहीं है. विद्यालय पहले का बना हुआ है और आसपास में जीएस की जमीन नहीं है इसलिए विभाग कंप्रोमाइज करके जो काश्तकार हैं उनके माध्यम से वार्ता करके रास्ता निकालेगा. इसका रास्ता राजस्व विभाग की टीम के माध्यम से निकाला जाएगा. निश्चित रूप से यह समस्या है और यह हम सबके संज्ञान में है.'

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