13 साल से अचेत पड़े हरीश राणा कौन हैं? सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में इन्हें दे दी इच्छा मृत्यु!
यूपी तक
• 11:47 AM • 11 Mar 2026
13 साल से कोमा में रहे हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला. कोर्ट ने 'गरिमा के साथ मरने के अधिकार' के तहत मेडिकल सपोर्ट हटाने की अनुमति दी. ये है पूरा मामला.
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 11 मार्च 2026 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 32 वर्षीय हरीश राणा का मेडिकल ट्रीटमेंट वापस लेने की अनुमति दे दी. मूल रूप से गाजियाबाद के रहने वाले हरीश पिछले 13 साल से लगातार कोमा में थे. जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने हरीश के माता-पिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया है.


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कोर्ट ने अपने जजमेंट में भावुक टिप्पणी करते हुए नोट किया कि हरीश राणा कभी 'एक होनहार युवा' थे और अपनी पढ़ाई कर रहे थे. लेकिन साल 2013 में एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी. जब वह चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान हॉस्टल की चौथी मंजिल की बालकनी से नीचे गिर गए थे. इस हादसे में उन्हें गंभीर ब्रेन इंजरी हुई थी, जिसके बाद से वह पिछले 13 सालों से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में चले गए और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो गए.
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जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किया. कोर्ट ने कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में मुख्य सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मौत मरीज के हित में है या नहीं, बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि क्या जीवन-रक्षक उपचार को अनिश्चितकाल तक जारी रखना मरीज के सर्वोत्तम हित में है? इसी आधार पर कोर्ट ने मेडिकल सपोर्ट हटाने का निर्णय लिया.


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सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि क्लिनिकली दी जाने वाली न्यूट्रिशन भी असल में मेडिकल ट्रीटमेंट का ही एक रूप है. अदालत ने कहा कि इसे तब वापस लिया जा सकता है, जब विशेषज्ञ डॉक्टरों का मेडिकल बोर्ड इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मरीज की रिकवरी की कोई भी सार्थक संभावना शेष नहीं बची है और बोर्ड स्वयं सपोर्ट वापस लेने की सिफारिश करे.
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हरीश राणा के मामले में कोर्ट के सामने पेश की गई मेडिकल रिपोर्टों ने स्थिति को साफ कर दिया था. रिपोर्टों से पता चला कि पिछले 13 साल के लंबे समय में उनकी शारीरिक या मानसिक स्थिति में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ है. वह पूरी तरह से अचेत अवस्था में थे. मेडिकल बोर्ड की इसी रिपोर्ट और सिफारिश के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उनके माता-पिता को यह कठिन निर्णय लेने की अनुमति दी.


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यह फैसला भारत में 'पैसिव यूथेनेशिया' (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) के कानून को और मजबूती देता है. कोर्ट ने दोहराया कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का ही एक हिस्सा माना जाता है. यह आदेश उन मरीजों के लिए एक नजीर बनेगा जो बिना किसी सुधार की उम्मीद के केवल मशीनों के सहारे वर्षों से जीवित रखे गए हैं.
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सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि हरीश राणा के मेडिकल सपोर्ट को हटाने की इस पूरी प्रक्रिया को अत्यंत मानवीय और गरिमापूर्ण तरीके से पूरा किया जाए. इस प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए एम्स (AIIMS) जैसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान की भूमिका शामिल हो सकती है. कोर्ट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज को अंतिम समय में किसी भी तरह की अनावश्यक पीड़ा न हो और विदाई गरिमापूर्ण रहे.
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