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आखिरकार तालिबान के साथ देवबंद का कनेक्शन है क्या?

अफगानिस्तान पर तालिबान ने कब्जा कर लिया है. इस बीच, इस बात को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या तालिबान यूपी के देवबंद सेमिनरी से प्रेरित है. तालिबान को देवबंदी विचारधारा से प्रेरित बताया जा रहा है. लेकिन उत्तर प्रदेश के देवबंद में कोई भी शख्स या उलेमा इस बारे में खुलकर बोलना नहीं चाहता.

आखिरकार तालिबान के साथ देवबंद का कनेक्शन है क्या?

इसको जानने के लिए हमें करीब डेढ़ सौ साल पीछे जाना होगा. 1857 के बाद जब देश में अंग्रेजी हुकूमत का शासन शुरू हुआ और इस्लामी शासन का अंत हो गया. तो इस्लाम की एक बार फिर स्थापना करने के नाम पर 1866 में मोहम्मद कासिम और राशिद अहमद गानगोही ने सच्चा इस्लाम और सच्चा मुसलमान बनाने के नाम पर देवबंद के दारुल उलूम में मदरसे की शुरुआत की. शुरुआत में कहा गया कि इस मदरसे का उद्देश्य इस्लाम धर्म की अच्छाइयों को दूसरे धर्म के लोगों को बताना है और इस्लाम धर्म से उन्हें प्रभावित करना है. बताया जाता है कि वर्तमान समय में अफगानिस्तान में जितने भी मदरसे हैं उनमें ज्यादातर मदरसे देवबंदी विचारधारा को मानने वाले हैं. तालिबान तलबा शब्द से बना है जिसका अर्थ छात्र होता है और ये तालिबान अफगानिस्तान और पाकिस्तान के देवबंदी मदरसे से निकले हुए छात्र हैं.

तालिबान के लोग क्या देवबंदी विचारधारा के हैं?

देवबंदी उलेमा मौलाना कारी मुस्तफा देहलवी (राष्ट्रीय अध्यक्ष इत्तेहाद उलेमा ए हिन्द) ने बताया कि हम इस पर कुछ नहीं कहेंगे, क्योंकि हम हिन्दुस्तानी लोग हैं. हिन्दुस्तान के कानून को हम मानते है वहां जो हो रहा है वह तालिबान और अफगानिस्तान के लोग समझें. हमें इससे कोई मतलब नहीं है.

वहीं, दूसरी तरफ मौलाना कारी राव साजिद ने भी इस बात का खंडन किया और कहा कि देवबंदी विचारधारा का तालिबान से कोई संबंध नहीं है. क्योंकि देवबंद दारुल उलूम से जो भी तलबा (छात्र) पढ़कर जाता है. वह हर शहर में मिलेगा. दारुल उलूम देवबंद से शांति अमन का पैगाम जाता है. भारत की आजादी में भी दारुल उलूम का बहुत योगदान रहा है. दारुल उलूम देवबंद हमेशा से शांति भाईचारे का पैगाम देता है. देवबंदी विचारधारा का तालिबान से कोई संबंध नहीं है.

विकिपीडिया के अनुसार, तालिबान एक रोमनकृत है जिसका अर्थ होता है स्टूडेंट यानी कि छात्र. तालिबान और देवबंद पर विकिपीडिया के हवाले से लिखा गया कि भारत के देवबंद शहर में इस्लाम की स्थापना को मूल में रखकर देवबंदी मदरसा की शुरुआत हुई. 19वीं सदी के अंत में मदरसा नाम पड़ा. इस मदरसे की स्थापना मोहम्मद कासिम नानौतवी, राशिद अहमद गंगोही और कई अन्य हस्तियों ने 1866 में की थी. वहीं भारतीय विद्रोह के आठ साल बाद 1857-58 देवबंदी आंदोलन की राजनीतिक शाखा, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, की स्थापना 1919 में हुई थी.

जमीयत उलेमा हिंद ने पूरे देश में प्रचार-प्रसार किया कि उसने स्वतंत्रता में बड़ी भूमिका निभाई. अफगानिस्तान का तालिबान दरअसल देवबंद सेमिनरी से निकली हुई विचारधारा का ही एक रूप है. यही नहीं, पाकिस्तान के 15 से 25% तालिबानी सुन्नी मुसलमान खुद को देवबंदी ही मानते हैं.

देवबंदी सेमिनरी से प्रभावित विचारों के समूह जैसे टीटीपी, एसएसपी, एलईजे, एक उग्रवादी विचारधारा का समूह है. वहीं, अफगान के प्रमुख नेता और पाकिस्तानी तालिबान नेताओं ने देवबंदी मदरसों से ही पढ़ाई भी की है. सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बांग्लादेश में अधिकांश मुस्लिम सुन्नी हैं जो मुख्य रूप से हनफी स्कूल के न्याय शास्त्र और धर्मशास्त्र को मानते हैं. उनमें से अधिकांश देवबंदी के साथ तबलीगी 51% बरेलवी या सूफी 26% हैं. कौमी संस्थाओं के रूप में देवबंदी ज्यादातर निजी इस्लामी मदरसों के मालिक हैं और बांग्लादेश में अधिकांश उलेमाओं का निर्माण करने का कार्य करते हैं.

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