मुख्तार अब्बास नकवी वेटिंग रह गए, घनश्याम लोधी ने मारी बाजी, BJP के इस कदम के मायने क्या?

शनिवार को जब बीजेपी ने यूपी के आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की, तो चर्चा कैंडिडेट्स के साथ-साथ मुख्तार अब्बास नकवी को लेकर भी चल पड़ी. लिस्ट आने से पहले जब भी यह सवाल पूछा जाता कि रामपुर सीट से बीजेपी किसे लड़ाएगी, तो एक नाम मुख्तार अब्बास नकवी का होता. ऐसा इसलिए क्योंकि 7 जुलाई को नकवी की राज्यसभा सदस्यता खत्म हो रही है और बीजेपी की तरफ से उन्हें आगामी राज्यसभा चुनावों में किसी प्रदेश से उम्मीदवारी नहीं दी गई. ऐसा इसलिए भी क्योंकि वह रामपुर की ही सीट है, जहां से 1998 के आम चुनावों में नकवी को जीत का पहला स्वाद मिला था. फिलहाल केंद्रीय कैबिनेट बर्थ बचाए रखने के लिए उन्हें रामपुर लोकसभा उपचुनाव में कंफर्म टिकट की जरूरत थी. पर ऐसा नहीं हुआ और उनकी जगह घनश्याम लोधी ने बाजी मार ली.

अहम बिंदु

अब मुख्तार अब्बास नकवी का क्या होगा? इस सवाल से ही जुड़े हुए सवाल यह भी हैं कि आखिर यूपी में दो लोकसभा सीटों पर होने जा रहे उपचुनाव को लेकर बीजेपी की पॉलिटिक्स क्या है? समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उलट आखिर बीजेपी ने जीत के लिए कौन सी राह पकड़ी है? आइए इसे सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं.

सबसे पहले जानते हैं कि घनश्याम लोधी कौन हैं

इस साल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले जब बड़े-बड़े ओबीसी और दलित नेता बीजेपी छोड़कर अखिलेश का साथ पकड़ रहे थे, तब अति पिछड़े तबके से आने वाले घनश्याम लोधी ने उल्टा रास्ता पकड़ा था. घनश्याम लोधी रामपुर से आते हैं और एक वक्त था जब उन्हें आजम खान का बेहद करीबी समझा जाता था. उस वक्त से पीछे जाएं तो असल में घनश्याम लोधी की राजनीति बीजेपी से ही शुरू हुई थी. भाजपा में जबतक कल्याण सिंह की तूती बोली, घनश्याम लोधी भी पार्टी के साथ रहे. 1999 में उन्होंने बीजेपी को छोड़ बसपा जॉइन की. फिर वह कल्याण सिंह की बनाई गई राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का भी हिस्सा रहे. बाद में 2011 में घनश्याम लोधी सपा का हिस्सा बने.

2016 में घनश्याम लोधी और आजम खान की नजदीकी का एहसास सूबे की सियासत को तब हुआ जब आजम ने उन्हें विधान परिषद में भेजने के लिए पूरी ताकत लगा दी. न सिर्फ पार्टी द्वारा पहले से तय किया गया टिकट कटवाया बल्कि अंतिम पलों में घनश्याम लोधी के लिए सिंबल हेलिकॉप्टर से लखनऊ से रामपुर पहुंचा और उनका नामांकन हुआ था. सपा के साथ घनश्याम लोधी का यह साथ जनवरी 2022 में खत्म हुआ और वह चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में शामिल हो गए.

ऐसा माना जा रहा है कि अखिलेश यादव ने रामपुर लोकसभा उपचुनाव में कैंडिडेट तय करने का विशेषाधिकार आजम खान को सौंप दिया है. यह सीट आजम खान ने ही खाली की है और इस बात की चर्चाएं तेज हैं कि उनकी पत्नी तंजीन फातिमा या बहू सिदरा अदीब यहां से प्रत्याशी हो सकती हैं. अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से यह एक रोचक मंजर होगा जब आजम को एक जमाने के अपने लॉयलिस्ट नेता से ही शह और मात का खेल खेलना पड़ेगा.

उपचुनावों के बरअक्स मुख्तार अब्बास नकवी की वेटिंग के मायने क्या हैं?

अब सवाल यह है कि आखिर लोकसभा के उपचुनावों में बीजेपी ने जिस तरह से कैंडिडेट दिए हैं और नकवी का नाम अंतिम क्षणों में बाहर हुआ है, तो इसके मायने क्या हैं. वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक मामलों के एक्सपर्ट हेमंत तिवारी कहते हैं कि ऐसा लगता है कि मुख्तार अब्बास नकवी की लंबी सक्रिय राजनीतिक पारी अब अवसान की ओर है. उनका मानना है कि बीजेपी की वर्तमान स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स में मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेताओं के लिए एक्टिव पॉलिटिक्स में कोई खास स्पेस बचता नजर नहीं आता. वह इशारा करते हैं कि नकवी संभवतः अब गवर्नर बनाने वाली राजनीति का हिस्सा हो सकते हैं.

नकवी से इतर, हेमंत तिवारी लोकसभा उपचुनावों के संदर्भ में बीजेपी की पॉलिटिक्स को भी डिकोड करते हैं. उनका कहना है कि आप सपा और बसपा के स्टैंड को देखिए. एक तरफ जब दोनों दल दलित और अल्पसंख्यक वोटों पर दांव लगा रहे हैं, तो बीजेपी ओबीसी पॉलिटिक्स (घनश्याम लोधी और निरहुआ) करती नजर आ रही है. एक पार्टी जो कुछ वर्षों पहले तक बनिया-ब्राह्मणों की पार्टी कही जाती थी, उसकी राजनीति को इस एंगल से भी समझा जाना चाहिए.

इस मामले को हमने यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और लंबे अरसे से चुनावी राजनीति को कवर कर रहे सैयद कासिम से भी समझना चाहा. सैयद कासिम ने कहा कि सिर्फ नकवी ही क्यों, जफर इस्लाम के सियासी रसूख को लेकर बीजेपी का यह कदम कई सवाल खड़ा करता है. वह बताते हैं कि जब राज्यसभा के लिए उम्मीदवारी की घोषणा नहीं हुई थी तो नकवी के साथ-साथ जफर इस्लाम के नाम की भी चर्चाएं तेज थीं.

अहम बिंदु

सैयद कासिम बताते हैं कि मध्य प्रदेश में बीजेपी के ऑपरेशन सिंधिया और कमलनाथ सरकार को गिराने में जफर इस्लाम की बड़ी भूमिका थी. ऐसे में इस बात की संभावना बेहद कम थी कि पार्टी उन्हें राज्यसभा नहीं भेजेगी पर ऐसा हुआ. सैयद कासिम को भी अब दोनों नेताओं के लिए गर्वनर पॉलिटिक्स में ही राह नजर आ रही है.

बहरहाल, यूपी में बीजेपी का यह सियासी दांव कितना कारगर होगा, इसका पता 23 जून को रामपुर-आजमगढ़ में वोटिंग के बाद 26 जून को काउंटिंग के दिन लग जाएगा. हालांकि इतना तय है कि आपातकाल के दौर में यानी 1975 में कांग्रेस के विरोध और जनता पार्टी के साथ अपनी राजनीति की शुरुआत करने और फिर लंबे समय तक बीजेपी की हिंदुवादी राजनीति में अल्पसंख्यक चेहरे की पहचान रखने वाले नकवी की राजनीतिक राह यहां से अस्पष्ट जरूर नजर आ रही है. इस बात की चर्चाएं जरूर हैं कि मुख्तार अब्बास नकवी कहीं उपराष्ट्रपति की रेस में न आ जाएं. जो भी हो, आने वाला वक्त नकवी की सियासत को लेकर बेहद अहम साबित होने जा रहा है.

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