कुसुम राय: जो थीं पार्षद, लेकिन कल्याण सिंह की सरकार में उन्हें मिलती थी VVIP सुरक्षा

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भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता कल्याण सिंह का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. बीजेपी के हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने वाले कल्याण…
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भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता कल्याण सिंह का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. बीजेपी के हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने वाले कल्याण सिंह का पूरा जीवन सियासी किस्सों से भरा रहा. ऐसा ही एक किस्सा है उनकी करीबी सहयोगी रहीं बीजेपी नेता कुसुम राय का. पीएम मोदी जब कल्याण सिंह के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए लखनऊ पहुंचे तो पत्रकारों के कैमरे की फ्रेम में कुसुम राय भी दिखीं. इस तस्वीर के सोशल मीडिया पर आते ही एक बार फिर पूर्व राज्यसभा सांसद कुसुम राय को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं. चलिए आज आपको कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में कुसुम राय के उस सियासी रसूख का किस्सा सुनाते हैं, जिसकी धमक 1999 में दिल्ली तक सुनाई देती थी.

किस्से की शुरुआत के लिए आपको 2021 से सीधे साल 1999 में लेकर चलते हैं. मई की चुभती गर्मियों के दिन थे और लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सियासी पारा चढ़ा हुआ था. कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और उन्हें जीवन में पहली बार एक ऐसे विरोध का सामना करना पड़ रहा था, जिसके सुर पार्टी के बाहर से नहीं बल्कि भीतर से ही उठ रहे थे. कल्याण सिंह कैबिनेट के कुछ सहयोगी और बीजेपी विधायकों का एक जत्था कल्याण सिंह के खिलाफ शिकायत लेकर दिल्ली पहुंच चुका था. उन शिकायतों का केंद्र बिंदु थीं लखनऊ म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन की 35 वर्षीय बीजेपी सदस्य कुसुम राय.

सोचने वाली बात यह है कि आखिर एक नगर निगम सदस्य से बीजेपी के दिग्गज नेताओं को क्या दिक्कत थी? असल दिक्कत थी कुसुम राय के बढ़ते राजनीतिक रसूख और कल्याण सिंह की सरकार में उनके प्रभाव से. तब इंडिया टुडे के लिए वरिष्ठ पत्रकार फरजंद अहमद ने लिखा था कि कुसुम राय काले रंग की सियेलो से चलती थीं. लाल बत्ती लगी गाड़ियां और मुख्यमंत्री की एलीट कोबरा फोर्स उनकी गाड़ी को एस्कॉर्ट करती दिखती थीं. कुसुम राय जब राजनीतिक यात्राओं पर निकलतीं तो जिला प्रशासन उनके लिए वही सुरक्षा मुहैया कराता जो VVIP लोगों को मिलती थी. लखनऊ के राजाजीपुरम स्थित अपने आवास पर कुसुम राय का दरबार लगता. इस दरबार में सरकारी अधिकारियों को लाइन लगाकर अपनी समस्याएं बताते देखा जा सकता था.

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आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि एक बीजेपी पार्षद होते हुए भी सत्ता की सर्वोच्च हनक दिखा रहीं कुसुम राय आखिर थीं कौन? कल्याण सिंह के संपर्क में वह कैसे आई थीं? इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक कुसुम राय यूपी के आजमगढ़ के मानपुर् गांव से ताल्लुक रखती हैं. एक सामान्य पारिवारिक बैकग्राउंड से आने वाली कुसुम राय के पिता जमीनी स्तर के संघ कार्यकर्ता थे. जब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने तो एक नजदीकी ने उन्हें कुसुम राय से परिचित कराया. कुसुम राय का सियासी कद इसके बाद तेजी से बढ़ा. जल्द ही वह कल्याण सिंह के करीबी नेताओं की सर्किल में शामिल हो गईं.

कल्याण सिंह से अपने रिश्ते को लेकर कुसुम राय ने इंडिया टुडे से खुलकर बात की थी. फरजंद अहमद ने इंडिया टुडे की अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि तब कुसुम राय ने बताया था कि उनके पिता आरएसएस-बीजेपी नेता थे. मुख्यमंत्री के साथ उनके पारिवारिक संबंध थे. रिपोर्ट के मुताबिक, कुसुम राय जिस सियासी ताकत का इस्तेमाल कर रही थीं उसको लेकर सार्वजनिक आलोचनाएं शुरू हो चुकी थीं. पुलिस-प्रशासन के मामलों तक में कुसुम राय का हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा था. चर्चे यहां तक थे कि अगर कोई अधिकारी सीएम ऑफिस में इस बात की शिकायत करता तो उधर से जवाब मिलता कि मैडम जैसा चाहती हैं, वैसा कीजिए.

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पार्टी के भीतर कुसुम राय को लेकर रोष बढ़ता जा रहा था पर कल्याण सिंह बेपरवाह दिख रहे थे. कल्याण सिंह ने तब इंडिया टुडे से कहा था कि उनका कुसुम राय के परिवार से पुराना नाता रहा है. सीएम आवास में कुसुम राय की बढ़ती आवाजाही के जवाब में तब सीएम ने कहा था कि सिर्फ वही नहीं बल्कि उनके पति और परिजन भी नियमित तौर पर मेरे दफ्तर आते रहते हैं.

कुसुम राय को लेकर तब मामला इतना बढ़ा कि करीब 3 दर्जन बीजेपी विधायकों ने पार्टी आलाकमान को अपने रोष से अवगत करा दिया. इन विधायकों ने कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग भी कर डाली. पार्टी ने तब के जनरल सेक्रेटरी के.एन. गोविंदाचार्य को इस मामले को सुलझाने के लिए लखनऊ भेजा. तबतक कुसुम राय सोशल वेलफेयर एडवाइजरी बोर्ड की चेयरपर्सन भी बनाई जा चुकी थीं. आखिरकार केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद कुसुम राय का इस्तीफा हुआ और मामला कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में चला गया. पर कुसुम राय के मामले और बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व से टकराव की वजह में पार्टी में कल्याण सिंह का मामला खराब हो चुका था.

1999 के मई में कुसुम राय के नाम से चढ़ा सियासी पारा उसी साल बीजेपी से कल्याण सिंह के निष्कासन से जाकर गिरा. दिसंबर 1999 में कल्याण सिंह ने अपनी नई पार्टी राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का ऐलान किया और यहां भी कुसुम राय उनके कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी नजर आईं. कहते हैं कि कल्याण सिंह की राजनीति फिर इसके बाद कभी अपने पुराने तेवर में नहीं लौट पाई. हालांकि, कल्याण सिंह की आखिरी इच्छा जरूर पूरी हुई और उनका पार्थिव शरीर बीजेपी के झंडे में लपेटा भी गया. कुसुम राय कल्याण सिंह की इस अंतिम यात्रा में भी उनके साथ चलती नजर आईं.

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