ट्रांसफर के बाद स्कूल छोड़ जाने लगे टीचर, तो फूट-फूटकर रोए बच्चे, भावुक कर देने वाला VIDEO

ट्रांसफर के बाद स्कूल छोड़ जाने लगे टीचर, तो फूट-फूटकर रोए बच्चे, भावुक कर देने वाला VIDEO
फोटो कोलाज: यूपी तक

गांवों के सरकारी स्कूल में मास्टर साहब के नाम से डरते-भागते-छुपते बच्चों की कहानियां तो अक्सर सामने आती रहती हैं. लेकिन गांव का स्कूल छोड़कर जाते अपने टीचर के लिए, बच्चों को यूं फूट-फूट कर रोते शायद ही कभी देखा हो. ये बच्चे यूपी के चंदौली में कंपोज़िट स्कूल में पढ़ते हैं और इन रोते, मन मसोसते बच्चों के बीच उतने ही इमोशनल होकर खड़े हैं इनके टीचर शिवेंद्र सिंह बघेल.

माजरा कुछ ये है कि शिवेंद्र सिंह का दूसरे ज़िले के स्कूल में ट्रांसफ़र हो गया है और ये बात इन बच्चों को मालूम है कि आज जब छुट्टी के बाद शिवेंद्र सर घर लौटेंगे, तो दोबारा उन्हें पढ़ाने नहीं आएंगे. लेकिन बच्चे तो फिर बच्चे हैं. ये नहीं चाहते कि उनके फेवरेट टीचर किसी हाल में यहां से जाएं.

ऐसा नहीं है कि इन मासूमों का प्यार शिवेन्द्र को एक-दो दिन में ही मिल गया हो, बल्कि ये तो उनकी पूरे 4 साल की कमाई है. जिस तरह से बच्चे बिलख-बिलख कर अपने टीचर से लिपटकर रो रहे हैं उसका मोल तो कुछ भी नहीं है.

दरअसल, शिवेंद्र 7 सितंबर 2018 को चंदौली के चकिया में मौजूद इस कंपोज़िट स्कूल में ट्रांसफर होकर आए थे. शिवेन्द्र बनारस में रहते थे सो रोज़ दो घंटे बाइक से सफ़र कर इन बच्चों को पढ़ाने चकिया आते थे.

शिवेन्द्र जैसा शायद ही कोई टीचर होगा जिसने न कभी किसी बच्चे पर न हाथ उठाया होगा, और न कभी डांटा होगा. बच्चों के साथ बच्चा बनकर उनको पढ़ाया. बच्चे ज़मीन पर बैठकर पढ़ते तो शिवेंद्र भी उनके साथ नीचे बैठ जाते. पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों से प्यार-दुलार और अपनेपन की बातें करते. शिवेन्द्र जब स्कूल में आए थे तो बच्चों की संख्या इतनी थी कि उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता था और जब जा रहे हैं तो पूरा स्कूल भरा रहता है.

शिवेन्द्र ने बताया कि टीचर्स डे पर उनकी ज्वाइनिंग हुई थी और गुरू पूर्णिमा पर विदाई. ये पल उनकी जिंदगी का सबसे भावुक क्षण था, जिसे वो कभी नहीं भूल पाएंगे.

कुछ तो बच्चों की मासूमियत और कुछ शिवेंद्र का अपनापन. बस यूं ही इन बच्चों के मन की डोर अपने टीचर से जुड़ गई और चार साल में, लगाव का ये धागा इतना मजबूत हो गया कि आज ये बच्चे अपने टीचर से दूर नहीं होना चाहते. शिवेन्द्र के साथ पढ़ाने वाले टीचर भी उनकी इसी सादगी और अपनेपन के कायल हैं.

शिवेन्द्र का भले ही ट्रांसफर हो गया हो लेकिन जो प्यार उन्हें चंदौली के बच्चों से मिला है वो उसे ताउम्र भूल नहीं पाएंगे.

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