योगी आदित्यनाथ जिस 'नाथ पंथ' से जुड़े हुए हैं, वो आखिर है क्या?

योगी आदित्यनाथ जिस 'नाथ पंथ' से जुड़े हुए हैं, वो आखिर है क्या?
योगी आदित्यनाथ(फोटो: विक्रम शर्मा/इंडिया टुडे)

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की धार्मिक और आध्यात्मिक छवि अक्सर चर्चा में रहती है. ऐसे में लोगों को यह जानने की उत्सुकता भी रहती है कि योगी आदित्यनाथ जिस 'नाथ पंथ' से जुड़े हुए हैं, वो आखिर है क्या? चलिए, कुछ दिलचस्प तथ्यों के साथ इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.

योगी आदित्यनाथ का नाम पहले अजय सिंह बिष्ट था. 15 फरवरी 1994 को बसंत पंचमी के अवसर पर गुरु महंत अवैद्यनाथ ने अजय का नाथ पंथ योगी के रूप में अभिषेक किया था.

अजय योगी आदित्यनाथ बनने के बाद नाथ पंथ के सबसे प्राचीन मठ गोरखनाथ मठ के महंत के रूप में अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी भी बन गए.

क्या है नाथ पंथ?

संस्कृत शब्द नाथ का अर्थ ‘भगवान’ या ‘रक्षक’ होता है. शांतनु गुप्ता की किताब 'योगीगाथा' के मुताबिक, नाथ पंथ को मध्य युगीन आंदोलन माना जाता है, जिसमें शैववाद, बौद्ध धर्म, हठ योग की भारतीय परंपराओं के विचार शामिल हैं. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, गुरु मत्स्येंद्रनाथ को नाथ संप्रदाय का संस्थापक माना जाता है, जिन्होंने शिव से शिक्षा हासिल की थी. गुरु मत्स्येंद्रनाथ ने अपने प्रत्यक्ष शिष्य गुरु गोरखनाथ के साथ मिलकर नाथ पंथ की सारी शिक्षा को जुटाया और उसे व्यवस्थित किया.

हजारी प्रसाद द्विवेदी की किताब ‘नाथ संप्रदाय’ के अनुसार, नाथ पंथी योगियों का मुख्य सम्प्रदाय गोरखनाथी योगियों का है. इन्हें ‘कनफटा’ या ‘दर्शनी’ साधु भी कहते हैं. कनफटा शब्द की उत्पत्ति इस तथ्य से जोड़कर बताई जाती है कि इस प्रकार के योगियों के कान को छेदा जाता है और वे एक विशेष प्रकार की बाली कान में पहनते हैं, जो मिट्टी, हाथी दांत या सोने आदि से बनी होता है.

कनफटा साधुओं में कान छेदने की प्रक्रिया को विस्तार से बताते हुए ब्रिग्स ने लिखा है कि कनफटा योगियों की एक विशिष्ट पहचान उनके छेदे गए कान और बड़ी-बड़ी बालियां होती हैं. दीक्षा दिए जाने के समारोह के अंतिम चरण में दोनों कान दो-धारी चाकू (या उस्तरा) से विशेष गुरु या शिक्षक द्वारा छेदे जाते हैं. फिर उनमें नीम की लकड़ी डाल दी जाती है और जब घाव भर जाते हैं, तब बड़ी-बड़ी बालियां डाल दी जाती हैं. इनको योगी मत का प्रतीक माना जाता है.

योगी को कठोर यौगिक अनुशासन का पालन करना पड़ता है, उसके बाद ही कान छेदने की प्रक्रिया होती है. कान छेदने के दौरान योगी से उम्मीद की जाती है कि वह न तो कांपेगा, न ही दर्द से रोएगा, नहीं तो उसे दीक्षा नहीं दी जाती है.

योगी आदित्यनाथ भी एक नाथ पंथी, कनफटा साधु हैं, जो सोने की पतली मुद्रा (बाली) पहनते हैं.

12 सितंबर 2014 को महंत अवैद्यनाथ के निधन के बाद एक पारंपरिक, औपचारिक समारोह के बाद योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश (मुख्य पुजारी) बन गए थे.

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