अयोध्या के शशांक तिवारी ने अपनी जान देकर बचाई साथी सैनिक की जिंदगी, राष्ट्रपति भवन में कीर्ति चक्र लेते वक्त फूट-फूटकर रो पड़ी मां

Lieutenant Shashank Tiwari: अयोध्या के वीर सपूत लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी ने उत्तर सिक्किम में उफनती नदी में कूदकर अपने अग्निवीर साथी की जान बचाई, लेकिन खुद देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया. उनकी वीरता और कर्तव्यनिष्ठा को सलाम करते हुए भारत सरकार ने मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया.

यूपी तक

• 02:57 PM • 09 Jun 2026

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Lieutenant Shashank Tiwari: कहा जाता है कि एक सैनिक सिर्फ सीमाओं की रक्षा नहीं करता, बल्कि अपने साथियों की सुरक्षा के लिए भी हर खतरे से लड़ जाता है. कुछ सैनिक अपनी बहादुरी से ऐसी मिसाल छोड़ जाते हैं, जिन्हें देश सालों तक याद रखता है. ऐसी ही एक कहानी है उत्तर प्रदेश के अयोध्या के वीर सपूत लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी की, जिन्होंने अपने कर्तव्य को अपनी जिंदगी से भी ऊपर रखा. एक साथी सैनिक की जान बचाने के लिए उन्होंने बिना अपनी परवाह किए उफनती नदी में छलांग लगा दी और आखिरकार अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया. उनकी बहादुरी और बलिदान को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित करने का फैसला किया. राष्ट्रपति भवन में जब उनके माता-पिता ने यह सम्मान ग्रहण किया तो वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं.

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उत्तर सिक्किम में गश्त के दौरान हुआ हादसा

यह घटना 22 मई 2025 की है. उत्तर सिक्किम के कठिन और दुर्गम पहाड़ी इलाके में लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी अपनी टीम के साथ गश्त पर थे. चारों तरफ ऊंचे पहाड़, कठिन रास्ते और तेज बहाव वाली नदियां थीं. सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन अचानक एक ऐसा हादसा हुआ जिसने हमेशा के लिए शशांक तिवारी का नाम वीरता के इतिहास में दर्ज कर दिया.

बताया गया कि गश्त के दौरान टीम के एक अग्निवीर साथी का पैर अचानक फिसल गया और वह तेज बहाव वाली नदी में जा गिरा. नदी का पानी बेहद तेज था और हालात इतने खतरनाक थे कि किसी को बचा पाना लगभग नामुमकिन माना जा रहा था.

बिना सोचे-समझे नदी में लगा दी छलांग

उस मुश्किल घड़ी में लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी के सामने दो रास्ते थे—एक अपनी सुरक्षा और दूसरा अपने साथी की जिंदगी बचाना. लेकिन उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने साथी को बचाने का फैसला किया.

उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना उफनती नदी में छलांग लगा दी. नदी का तेज बहाव, नुकीली चट्टानें और बेहद खतरनाक हालात उनके सामने थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. अपनी जान जोखिम में डालकर वह किसी तरह अपने साथी तक पहुंचे और काफी संघर्ष के बाद उसे सुरक्षित बाहर निकाल लिया. उनकी बहादुरी की वजह से एक सैनिक की जान बच गई और एक परिवार उजड़ने से बच गया.

साथी बच गया, लेकिन शशांक नहीं लौट सके

हालांकि इस बहादुरी की कीमत लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी को अपनी जिंदगी देकर चुकानी पड़ी. गंभीर चोटों और तेज बहाव के कारण वह खुद को सुरक्षित नहीं बचा सके.

मातृभूमि की सेवा करते हुए और सैनिक धर्म निभाते हुए उन्होंने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया. उनकी शहादत ने पूरे देश को भावुक कर दिया. लोगों ने कहा कि यही एक सच्चे सैनिक की पहचान होती है, जो अपनी जिंदगी से पहले अपने साथी और देश को महत्व देता है.

अदम्य साहस के लिए मिला कीर्ति चक्र

लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी के साहस, कर्तव्यनिष्ठा और बलिदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र देने की घोषणा की. कीर्ति चक्र देश का दूसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार माना जाता है.

जब राष्ट्रपति भवन में सम्मान समारोह आयोजित किया गया, तब वहां मौजूद हर व्यक्ति का दिल भावुक हो उठा. यह सिर्फ एक सैनिक को सम्मान देने का क्षण नहीं था, बल्कि देश की तरफ से एक वीर बेटे को श्रद्धांजलि देने का अवसर भी था.

बेटे का सम्मान लेने पहुंचे माता-पिता

सम्मान समारोह में लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी की मां नीता तिवारी और पिता जंग बहादुर तिवारी अपने बेटे की ओर से कीर्ति चक्र लेने पहुंचे. सोचिए उस मां के दिल पर क्या बीत रही होगी, जिसने अपने बेटे को बचपन से बड़े सपनों के साथ पाला हो, लेकिन आज उसी बेटे का वीरता सम्मान उसे खुद लेना पड़ रहा हो. समारोह के दौरान जैसे ही शशांक तिवारी की बहादुरी और बलिदान की कहानी सुनाई गई, उनकी मां अपने आंसू नहीं रोक पाईं और फूट-फूटकर रोने लगीं. वह दृश्य इतना भावुक था कि वहां मौजूद कई लोगों की आंखें भी नम हो गईं.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पोछे शहीद मां के आंसू

सम्मान समारोह के दौरान एक बेहद भावुक पल तब आया, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू खुद आगे बढ़ीं और शहीद की मां के आंसू पोछे. यह दृश्य सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, बल्कि पूरे देश की ओर से उस वीर परिवार के प्रति सम्मान और संवेदना का प्रतीक बन गया. उस पल ने हर किसी को भावुक कर दिया और यह दिखा दिया कि देश अपने वीर सपूतों और उनके परिवारों के बलिदान को कभी नहीं भूलता.

हमेशा याद रहेंगे लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी

आज भले ही लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बहादुरी, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा हमेशा जीवित रहेगी. जब भी देशभक्ति, सैनिक धर्म और साथी के लिए बलिदान की बात होगी, उनका नाम गर्व के साथ लिया जाएगा.

अयोध्या का यह वीर बेटा भले ही इस दुनिया से चला गया हो, लेकिन उसने अपनी बहादुरी से इतिहास में अपना नाम हमेशा के लिए अमर कर दिया. पूरा देश इस वीर सपूत को श्रद्धापूर्वक नमन करता है.